भारत गांवों का देश कहा जाता है लेकिन हाल के वर्षों में देश में शहरीकरण में आयी तेजी और रोजगार की तलाश में गांवों से पलायन के कारण गांवों की संख्या में कमी आ रही है।
नई दिल्ली। भारत गांवों का देश कहा जाता है लेकिन हाल के वर्षों में देश में शहरीकरण में आयी तेजी और रोजगार की तलाश में गांवों से पलायन के कारण गांवों की संख्या में कमी आ रही है। उत्तराखंड और अन्य पर्वतीय व जंगल बहुल क्षेत्रों में विकास की कमी और प्राकृतिक आपदाओं के कारण कई गांव खाली हो रहे हैं। एक आकलन के अनुसार 2011 से 2021 के बीच ग्रामीण आवासों का शहर में विलय या 'भूतिया गांवों' (Empty Villages) में तब्दील होना इसके मुख्य कारण हैं।
खूबसूरत ग्रामीण जीवन पर शहरीकरण की छाया
हमारा देश गांवों का देश कहा जाता था। कभी भारत की पहचान उसके गाँवों और वहाँ की मिट्टी से जुड़ी खुशबू से होती थी। गाँवों की कच्ची सड़कें, हरियाली से लहलहाते खेत, तालाबों में खेलते बच्चे और आपस में जुड़कर रहते लोग - यही तो हमारे ग्रामीण परिवेश की असली खूबसूरती थी। लेकिन देश में बढ़ रही शहरीकरण की रफ्तार में यह खूबसूरती आने वाले समय में नष्ट हो सकती है।
आंकड़ों ने दिखाई गांवों के सिकुड़ने की हकीकत
भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त (RGI) द्वारा जारी आंकड़ों ने भी इस तथ्य पर मुहर लगा दी है कि भारत में ग्रामीण क्षेत्र (गांव) सिकुड़ रहे हैं और शहरीकरण में तेजी से वृद्धि हो रही है। मार्च 2026 तक की जानकारी के अनुसार, 2011 की जनगणना की तुलना में आने वाले दिनों में गांवों की संख्या में 1000 से अधिक की कमी आने का अनुमान है।
जनगणना के अनुमान और गांवों में गिरावट का संकेत
RGI द्वारा दिये गये डाटा के अनुसार भारत में ग्रामीण बस्तियों के शहरी क्षेत्रों में बदलने और अन-इनहैबिटेड (निर्जन) होने के कारण गाँवों की संख्या में कमी आ रही है। नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार, 2011 की जनगणना की तुलना में 2026 में गाँवों की संख्या में 1,030 से अधिक की कमी आने की संभावना है।
डिजिटल जनगणना 2026 की शुरुआत
देश में जनगणना का पहला चरण इस बुधवार एक अप्रैल से शुरू होने वाला है। यह भारत की पहली पूर्ण डिजिटल जनगणना होगी। जनगणना के पहले चरण में मकानों की सूचीकरण किया जाना है जो अप्रैल से सितंबर 2026 तक होगा। इसका दूसरा चरण फरवरी 2027 में शुरू होगा। यह जनगणना 2011 की परिभाषाओं को ही आधार बनाकर की जा रही है ताकि इसका तुलनात्मक अध्ययन किया जा सके। इसमें 6 लाख से अधिक गांवों और 5,000 से अधिक सांविधिक नगरों को शामिल किया जाएगा।
नई जनगणना से गांवों की संख्या में बड़े बदलाव की आशंका
भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त (RGI) द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार नयी जनगणना के बाद देश में गांवों की संख्या में बड़ा बदलाव आ सकता है। साल 2011 की जनगणना की तुलना में लगभग 1030 कम गांव होने की संभावना है। इसका मुख्य कारण है कि कई गांव अब शहरी क्षेत्रों (Urban Areas) में बदल चुके हैं या उनमें विलीन हो गए हैं। अंग्रेजी दैनिक "द हिन्दू" में प्रकाशित एक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया है।
रिपोर्ट में सामने आया गांवों के कम होने का कारण
जनगणना आयुक्त (RGI) द्वारा जारी आंकड़ों और आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, ग्रामीण युवा रोजगार और बेहतर जीवन के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 2011 की जनगणना की तुलना में, 2026-27 की जनगणना की तैयारियों के दौरान 1,030 कम गाँव दर्ज किए गए हैं।
2011 से 2021 के बीच गांवों की संख्या में ऐतिहासिक गिरावट
भारत में 2011 से 2021 के बीच गांवों की कुल संख्या में पहली बार गिरावट दर्ज की गई है, जो तेजी से बढ़ते शहरीकरण का संकेत है। 2011 में 6,40,869 गांव थे, जो 2021 में घटकर 6,28,221 रह गए हैं। इस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों के शहरी क्षेत्रों (Census Towns) में बदलने के कारण गाँवों की कुल संख्या में कमी आई है।
पलायन, रोजगार और आपदाएं - गांवों के खाली होने की वजह
देश में गांवों की संख्या में आ रही कमी का मुख्य कारण शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की तलाश में ग्रामीण आबादी का शहरों की ओर पलायन को माना जा रहा है। विशेषकर हिमालयी क्षेत्रों से पलायन करने वालों की संख्या में हाल के वर्षों में तेजी आयी है। उत्तराखंड और बिहार जैसे राज्यों में प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, बादल फटना और भूस्खलन के कारण बस्तियों का उजड़ जाना आदि भी इसका बड़ा कारण है।
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