प्रधानमंत्री Narendra Modi की विदेशी मुद्रा और पेट्रोल, डीज़ल बचाने, सोना खरीदने से परहेज करने और उर्वरकों का उपयोग घटाने की सलाह ने देश में ऊर्जा भंडार और अर्थव्यवस्था को लेकर नयी बहस छिड़ गयी है।
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री Narendra Modi की विदेशी मुद्रा और पेट्रोल, डीज़ल बचाने, सोना खरीदने से परहेज करने और उर्वरकों का उपयोग घटाने की सलाह ने देश में ऊर्जा भंडार और अर्थव्यवस्था को लेकर नयी बहस छिड़ गयी है। पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी नाकेबंदी के कारण देश में ऊर्जा की आपूर्ति बाधित है। इससे पेट्रोलियम कंपनियों को रोजाना भारी नुकसान हो रहा है। इसे देखते हुए माना जा रहा है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में जल्द इजाफा हो सकता है।
विपक्ष पहले से जता रहा आशंका
कांग्रेस नेता Rahul Gandhi समेत पूरा विपक्ष खाड़ी युद्ध को देखते हुए चार राज्यों के चुनाव के बाद पेट्रोल डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी की आशंका व्यक्त कर रहा था। कमर्शियल गैस, प्रीमियम पेट्रोल की कीमतें कंपनियां पहले ही बढ़ा चुकी हैं। लेकिन केन्द्र सरकार घरेलू उपभोक्ताओं पर बोझ डालने के बजाय खुद घाटा झेलने की दलील देते हुए कीमतों में संभावित बढ़ोतरी की संभावना से साफ तौर पर इनकार कर रही थी। मगर अब सरकार के आधिकारिक रुख में भी बदलाव दिख रहा है।
सरकार के रुख में बदलाव
केन्द्र सरकार अब ये कहने लगी है कि अब तक की कोशिश रही है कि कीमतों में कोई बढ़ोतरी न हो। परन्तु पिछले दो हफ्तों में ईंधन की कीमतों में बदलाव के बाद स्थिति पहले जैसी नहीं रही। होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से पार पहुंच गयी हैं। इससे सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों को पेट्रोल, डीजल और तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) की बिक्री पर होने वाला नुकसान बढ़कर 30,000 करोड़ रुपये प्रति महीना हो गया है। ऐसे में पेट्रोल, डीजल के रेट में वृद्धि की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
सरकार पर विपक्ष का हमला
विपक्ष सरकार की इस दलील को पूरी तरह से खारिज कर रहा है। विपक्ष का कहना है कि खाड़ी देशों में संघर्ष और ईरान के साथ चल रहे तनाव से पहले, ब्रेंट क्रूड ऑयल 70 डॉलर के आसपास था। रूस से भी भारत को सस्ता कच्चा तेल भारतीय मुद्रा में मिल रहा था। लेकिन सरकार ने कच्चे तेल की कम कीमतों का लाभ जनता को सीधे नहीं दिया और 2014-2026 के बीच कई बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर अपना और कंपनियों का खजाना भरा। रूस से मिलने वाले सस्ते क्रूड का लाभ जनता के बजाय रिलायंस और नायरा जैसी कंपनियों को मिला। विपक्षी दलों ने इसे "लूट" करार दिया और कहा कि सरकार की गलत नीतियों का देश की जनता को नुकसान हो रहा है।
मंत्रालय ने मानी वित्तीय चुनौती
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने विगत 8 मई को अंतर-मंत्रालय संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि तेल मार्केटिंग कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर दबाव पड़ रहा है क्योंकि वे लगातार कम दरों पर ईंधन बेच रही हैं। शर्मा ने कहा कि भारत सरकार ने अब तक ग्राहकों के लिए कीमतें स्थिर रखने की कोशिश की है।
रिपोर्ट में बढ़ोतरी का अनुमान
इससे पहले ब्रोकरेज फर्म कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज ने अप्रैल के महीने में ही एक रिपोर्ट में कहा था कि पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु सहित अन्य राज्यों में चुनावों के बाद देश में ईंधन की खुदरा कीमतें 25 से 28 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ सकती हैं। यह अनुमान भारतीय क्रूड बास्केट के 120 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचने और पेट्रोल-डीजल की बिक्री पर कम मार्जिन को देखते हुए लगाया गया था। तेल मंत्रालय ने इस रिपोर्ट को 'फर्जी खबर' करार देते हुए आरोप लगाया था कि इसका मकसद जनता के बीच डर और घबराहट पैदा करना है।
विशेषज्ञों ने दी चेतावनी
विश्व की अग्रणी सेवा फर्म KPMG में ऊर्जा, प्राकृतिक संसाधन और रसायन विभाग के वैश्विक प्रमुख Anish De ने इस संबंध में कहा, "होर्मुज स्ट्रेट पहले कभी बंद नहीं हुआ था और मौजूदा हालात दुनिया के लिए अभूतपूर्व हैं। हालांकि युद्ध हमारी सीमाओं पर नहीं हो रहा है फिर भी यह हमारी मुख्य ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था की ताकत है कि देश अब तक इसका सामना करने में सक्षम रहा है लेकिन लंबे समय से समस्या बनी रहने की वजह से अब स्थिति बिगड़ रही है।" केपीएमजी के अनीश दे ने कहा कि कच्चे तेल की मौजूदा कीमतें और कंपनियों को हो रहे नुकसान को देखते हुए पेट्रोल और डीजल के दाम में 20 फीसदी की बढ़ोतरी जरूरी है। हालांकि कीमतों में इतनी बड़ी बढ़ोतरी की संभावना कम ही है।
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