इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने शाजापुर के जिला कलेक्टर द्वारा एक सरकारी कर्मचारी की दो वेतनवृद्धियां (increments) रोकने के आदेश पर कड़ा रुख अपनाया है।
इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने शाजापुर के जिला कलेक्टर द्वारा एक सरकारी कर्मचारी की दो वेतनवृद्धियां (increments) रोकने के आदेश पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने सवाल किया है कि जब जांच में आरोप सिद्ध नहीं हुए, तो सजा का प्रावधान कैसे किया गया?
यह है पूरा मामला?
शाजापुर निवासी जयंत बघेरवाल, जो राजस्व विभाग में सहायक ग्रेड-3 के पद पर पिछले 30 वर्षों से 'बेदाग' सेवा दे रहे हैं, उनके खिलाफ रिश्वत के आरोप लगाए गए थे। उन पर ₹35,000 और ₹15,000 की घूस लेने का आरोप लगाया गया था। विभागीय जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि जयंत बघेरवाल के खिलाफ घूस के आरोप सिद्ध नहीं हो पाए।
कलेक्टर का आदेश
जांच रिपोर्ट में निर्दोष पाए जाने के बाद भी तत्कालीन कलेक्टर ने संचयी प्रभाव (with cumulative effect) से उनकी दो वेतनवृद्धियां रोकने का आदेश जारी कर दिया।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
कर्मचारी ने अधिवक्ता यश नागर के माध्यम से याचिका दायर की। याचिका में तर्क दिया गया कि बिना किसी ठोस सबूत या सिद्ध आरोप के सजा देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है। कानूनी रूप से वेतनवृद्धि रोकना एक बड़ी सजा की श्रेणी में आता है, जिसके लिए पूर्ण विभागीय जांच और आरोप सिद्ध होना अनिवार्य है। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर से स्पष्टीकरण मांगा है कि इस प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी क्यों की गई।
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