कूनो में चीते भारत के वातावरण में ढल रहे हैं, वैज्ञानिक कहते हैं कि उनकी मृत्यु के बाद भी आनुवंशिक पदार्थ सुरक्षित रहना चाहिए।
कूनो। जैसे-जैसे चीते भारत के वातावरण के अनुसार ढल रहे हैं, वैज्ञानिकों का मानना है कि बीमारी, तनाव या पर्यावरणीय चुनौतियों के कारण यदि किसी चीते की मृत्यु हो भी जाए, तो उसका आनुवंशिक पदार्थ हमेशा के लिए नष्ट नहीं होना चाहिए।
नौ चीते नए चरण में
बोत्सवाना से आए नौ चीतों (छह मादा और तीन नर) के मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क पहुँचने के साथ ही भारत की महत्वाकांक्षी चीता पुनर्वास परियोजना एक नए चरण में प्रवेश कर गई है।
वैज्ञानिक बैकअप की भी पहल
अभी उनकी संख्या बहुत कम है और समाप्त होने का जोखिम बना हुआ है। इसलिए वैज्ञानिक मानते हैं कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि “चीते हमेशा के लिए जीवित रहें”, एक मजबूत वैज्ञानिक बैकअप होना चाहिए।
भारत का अनोखा संस्थान
भारत के पास ऐसा एक अनोखा संस्थान है जिसे LaCONES (Laboratory for the Conservation of Endangered Species) कहा जाता है। यह हैदराबाद में स्थित है और 1998 से विकसित किया जा रहा है।
देश में चीतों की स्थिति
सितंबर 2022 में नामीबिया से चीतों के पहले स्थानांतरण के बाद और 2023 में दक्षिण अफ्रीका से अतिरिक्त चीतों के आने के बाद भारत में अब लगभग 39 अफ्रीकी चीते हैं। इनमें भारत में जन्मे कुछ शावक भी शामिल हैं।
कोशिकीय संरक्षण भी जरूरी
जैसे-जैसे इनकी संख्या बढ़ रही है और वे नियंत्रित देखभाल से निकलकर खुले जंगल में रहने लगे हैं, वैज्ञानिकों का कहना है कि अब केवल जमीन पर संरक्षण ही नहीं बल्कि कोशिकीय स्तर पर संरक्षण भी जरूरी है।
प्रयोगशाला में यह संभव
वैज्ञानिकों के अनुसार, प्रयोगशाला में कोशिकाओं को संरक्षित करके किसी पशु के आनुवंशिक पदार्थ को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
संकट के समय अवसर
वन विभाग अक्सर जानवरों को कई कारणों से बेहोश (tranquilise) करता है—जैसे चोट लगना, मानव-वन्यजीव संघर्ष या स्थानांतरण।
ऊतक को सुरक्षित रखना संभव
LaCONES के वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे समय में जानवरों से छोटे-छोटे ऊतक (tissue) नमूने लेकर सुरक्षित रखना एक बड़ा अवसर है।
नमूना एकत्र करने का अच्छा अवसर
LaCONES के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. कार्तिकेयन वासुदेवन कहते हैं, “जब वन विभाग अलग-अलग कारणों से जानवरों को बेहोश करता है, तो यह नमूने एकत्र करने का अच्छा अवसर होता है।” वे कहते हैं कि अभी यह काम बहुत कम होता है और इसे अधिक नियमित रूप से किया जाना चाहिए।
इतिहास से मिली सीख
भारत के संरक्षण वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ा सबक है—एशियाई चीते का भारत से पूरी तरह समाप्त हो जाना। डॉ. वासुदेवन बताते हैं कि जब भारत में एशियाई चीता विलुप्त हुआ, तब आधुनिक आणविक जीवविज्ञान (molecular biology) विकसित नहीं हुआ था। इसलिए उस समय चीतों के ऊतक या कोशिकाओं को संरक्षित करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। इस कारण आज भारत के पास अपने मूल चीतों का कोई जीवित आनुवंशिक नमूना नहीं है—केवल संग्रहालय के नमूने और ऐतिहासिक रिकॉर्ड ही बचे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि अब यह गलती दोबारा नहीं होनी चाहिए।
बायोबैंक: संरक्षण का बीमा
LaCONES अपने काम को जैव विविधता संरक्षण का वैज्ञानिक बैकअप मानता है। डॉ. वासुदेवन इसे “जैव विविधता संरक्षण का UPS” कहते हैं। उनके अनुसार, “बायोबैंक एक बैकअप की तरह काम करता है। यह भविष्य के शोध के लिए आवश्यक जैविक सामग्री उपलब्ध करा सकता है।”
26 प्राजातियों के उत्तक और कोशिका हैं
आज LaCONES के पास 26 प्रजातियों के ऊतक और कोशिका नमूने सुरक्षित हैं। इनमें कई बड़े मांसाहारी और अन्य स्तनधारी जानवर भी शामिल हैं। इन नमूनों का उपयोग कई शोध संस्थानों द्वारा आनुवंशिक अध्ययन के लिए किया जा चुका है।
चीतों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है
यदि कूनो नेशनल पार्क में रहने वाले चीतों की बीमारी, दुर्घटना या अन्य कारणों से मृत्यु हो जाती है, तो उनके ऊतक और कोशिकाओं को संरक्षित करना भविष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है। हालाँकि अभी तक LaCONES को कूनो के चीतों से ऊतक नमूने नहीं मिले हैं। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत के पास ऐसा करने के लिए आवश्यक संस्थागत ढांचा पहले से मौजूद है। LaCONES को Central Zoo Authority का समर्थन प्राप्त है।
राष्ट्रीय नेटवर्क बनाने की योजना
LaCONES केवल एक जगह नमूने रखने के बजाय देशभर के चिड़ियाघरों और संरक्षण केंद्रों के साथ मिलकर बायोबैंक का नेटवर्क बनाना चाहता है। इससे अलग-अलग संस्थानों में नमूने सुरक्षित रहेंगे और वैज्ञानिक जानकारी साझा की जा सकेगी।
लंबी अवधि की तैयारी
भारत की चीता परियोजना एक दीर्घकालिक पारिस्थितिक प्रयोग है, जिसका पूरा परिणाम आने में कई वर्ष या दशकों लग सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य के लिए आनुवंशिक संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। दुनिया भर में अब पशु बायोबैंकिंग को वन्यजीव संरक्षण का एक महत्वपूर्ण साधन माना जा रहा है।
केवल जंगल ही सहायक नहीं
जब चीते फिर से भारतीय धरती पर दौड़ रहे हैं, तो हैदराबाद में हो रहा यह वैज्ञानिक काम यह दिखाता है कि आधुनिक संरक्षण केवल जंगल में जानवरों की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी कोशिकाओं और आनुवंशिक सामग्री को भी भविष्य के लिए सुरक्षित रखने से जुड़ा है।
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