भोपाल। अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर तीन किरदार जिसने मुकाम हासिल की और उनके जज्बे को...
भोपाल। अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर तीन किरदार जिसने मुकाम हासिल की और उनके जज्बे को हर कोई सलाम करता है। सत्या गोपालकृष्णन ने जीवन की कठिन बाधा को पार किया और आज अमेरिका में एनवायरमेंटल एकानामिक्स की प्रोफेसर हैं, वहीं भोपाल की शिवानी सेन शहर के कोशिस कैफे में मैनेजन के पद पर कार्यरत हैं और स्तुति दोशी जो भोपाल के ताज होटल में रिसेप्शनिस्ट हैं।
यह कहानी उन तीन लड़कियों की है, जिन्होंने जीवन की सबसे कठिन बाधाओं को पार कर दुनिया के सामने मिसाल पेश की है। सत्या की शुरूआती प्रशिक्षण भोपाल के एक विशेष स्कूल आरूषि में हुई, जो अहम साबित हुई। उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चली गई।
भीषण हादसे में पैर बेकार हुआ
एक भीषण सड़क दुर्घटना में सत्या के पैर पूरी तरह बेकार हो गए थे। डॉक्टरों को उन्हें बचाने के लिए एक-दो नहीं, बल्कि 25 सर्जरी करनी पड़ीं।
अफ़सोस नहीं, गर्व चाहिए
सत्या का कहना है कि लोग अक्सर दिव्यांगता को दया की दृष्टि से देखते हैं, लेकिन वे कहती हैं। मुझ पर अफ़सोस मत करो, मैं अलग नहीं हूँ। वे चाहती हैं कि समाज उन्हें उनकी शारीरिक अक्षमता से नहीं, बल्कि उनकी काबिलियत से पहचाने।
फिर पाया सफलता का मुकाम
आज सत्या अमेरिका की ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी में एक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। अपनी शारीरिक चुनौतियों को पीछे छोड़ते हुए उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।
समाज के लिए संदेश
महिला दिवस के विशेष अवसर पर सत्या ने समाज की मानसिकता पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा, "हर चीज़ हम औरतों पर नहीं छोड़ सकते। हमें लड़ना है, लेकिन हमारी सोसाइटी में महिलाओं के खिलाफ एक पूर्वाग्रह है।" उनका मानना है कि इस पूर्वाग्रह को दूर करने के लिए केवल महिलाओं को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को एकजुट होकर आगे आना होगा।
इसी तरह, भोपाल की शिवानी सेन की सफलता
भोपाल की शिवानी सेन की प्रेरणादायक यात्रा है, जिन्होंने डाउन सिंड्रोम जैसी चुनौती को मात देकर सफलता की एक नई मिसाल कायम की है। खुद से कपड़े नहीं पहन पाती थी, वो आज है कैफे की मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं।
मप्र की राजधानी के पंचशील नगर की 26 वर्षीय शिवानी सेन की कहानी दृढ़ संकल्प और अटूट पारिवारिक प्रेम की एक अद्भुत मिसाल है। शिवानी का जन्म डाउन सिंड्रोम (एक जेनेटिक डिसऑर्डर) के साथ हुआ था, जिसके कारण उनका शारीरिक और मानसिक विकास बहुत धीमी गति से हो रहा था। जन्म के समय डॉक्टरों ने यहाँ तक कह दिया था कि शिवानी शायद कभी बोल भी नहीं पाएंगी।
परिवार का अटूट विश्वास और संकल्प
शिवानी की बड़ी बहन शशि बताती हैं कि एक समय ऐसा था जब समाज और कुछ डॉक्टरों ने भी शिवानी के भविष्य को लेकर उम्मीद छोड़ दी थी। लेकिन उनके परिवार ने हार नहीं मानी। उन्होंने शिवानी के पालन-पोषण और बेहतरी के लिए हर संभव जानकारी जुटाई और हार नहीं मानने का फैसला किया।
विश्वास स्कूल बना टर्निंग प्वाइंट
परिवार की इसी खोज ने उन्हें भोपाल के 'विश्वास स्कूल' तक पहुँचाया। यह शिवानी के जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। यहाँ आकर शिवानी ने न केवल नई चीज़ें सीखीं, बल्कि पहली बार खुद को स्वतंत्र महसूस किया।
उपलब्धि ने बांधा सेहरा
जो लड़की कभी अपने रोज़मर्रा के काम जैसे कपड़े पहनना भी खुद नहीं कर पाती थी, आज वह अपनी मेहनत और परिवार के सहयोग से एक कैफे की मैनेजर के रूप में सफलतापूर्वक काम कर रही है। शिवानी की यह कहानी साबित करती है कि अगर सही साथ और हौसला मिले, तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती।
आत्मनिर्भरता से संगीत के मंच तक का सफर
किसी के जीवन में सही मार्गदर्शन और सहारा मिल जाए, तो वह नामुमकिन को भी मुमकिन कर सकता है। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी है शिवानी की, जिनका जीवन 'आरुषी' (Arushi India) नामक स्वयंसेवी संस्था (NGO) से जुड़ने के बाद पूरी तरह बदल गया।
शुरू में जीवन की बुनियादी काम में दिक्कत थी
शिवानी के लिए शुरुआती सफर आसान नहीं था। साल 2013 में जब वह पहली बार 'आरुषी' संस्थान के संपर्क में आईं, तब वह अपनी दैनिक जरूरतों के लिए भी दूसरों पर निर्भर थीं। संस्थान के शिक्षकों के अनुसार, उस समय शिवानी खुद से भोजन करना या कपड़े पहनना जैसे बुनियादी कार्य भी नहीं कर पाती थीं।
फिर चली बदलाव की बयार
संस्थान ने सबसे पहले शिवानी को 'दैनिक जीवन की गतिविधियाँ' (Daily Living Activities) सिखाने पर ध्यान केंद्रित किया। धीरे-धीरे, ट्रेनिंग और सही देखरेख के कारण उनके व्यवहार और आत्मविश्वास में सुधार होने लगा।
छिपी प्रतिभा उभरी, अचानक ढोलक बजाना व गाना शुरू किया
शिवानी के जीवन में सबसे बड़ा 'टर्निंग पॉइंट' तब आया, जब उनके अंदर की सुप्त प्रतिभाएं उभरकर सामने आईं। ट्रेनिंग के दौरान एक दिन अचानक उन्होंने ढोलक बजाना और गाना शुरू कर दिया। उनके इस हुनर ने सबको हैरान कर दिया और यहीं से पता चला कि उन्हें संगीत में गहरी रुचि है।
संगीत के प्रति जुनून
संगीत के प्रति उनके जुनून को देखते हुए संस्थान ने उन्हें और भी कई क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया। संगीत के अलावा शिवानी को अभिनय के माध्यम से अभिव्यक्ति की कला, खान-पान की वस्तुएं बनाने का हुनर, पॉटरी (मिट्टी के बर्तन) में रचनात्मकता को आकार देना, कस्टमर अटेंडेंस में लोगों से संवाद करने और व्यावसायिक शिष्टाचार की सीख जैसी व्यावसायिक प्रशिक्षण (Vocational Training) दिया गया।
दूसरों के लिए मिसाल बनी
आज शिवानी न केवल आत्मनिर्भर बनने की ओर अग्रसर हैं, बल्कि अपनी प्रतिभा से दूसरों के लिए एक मिसाल भी बन रही हैं। 'आरुषी' संस्थान के प्रयासों और शिवानी के दृढ़ संकल्प ने यह साबित कर दिया है कि बाधाएं चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, सही दिशा में किया गया प्रयास जीवन बदल सकता है।
इधर, स्तुति दोषी का मेडिकल ट्रीटमेंट से होटल ताज के रिसेप्शन तक का सफर
अहमदाबाद में साल 2002 में जन्मी स्तुति दोषी की कहानी केवल संघर्ष की ही नहीं, बल्कि अटूट इच्छाशक्ति और जीत की भी है। डाउन सिंड्रोम के साथ जन्मी स्तुति ने समाज की बनी-बनाई धारणाओं को तोड़ते हुए अपनी एक अलग पहचान बनाई है।
4 महीने में ही इलाज और फिजियोथेरेपी
स्तुति के जन्म के तुरंत बाद ही उनके परिवार को उनकी स्थिति (डाउन सिंड्रोम) के बारे में पता चल गया था। समय की अहमियत को समझते हुए, उनके माता-पिता ने बिना एक पल गंवाए मात्र 4 महीने की उम्र से ही उनका इलाज और नियमित फिजियोथेरेपी शुरू करवा दी थी। यही वह शुरुआती प्रयास था जिसने उनके भविष्य की मजबूत नींव रखी।
भोपाल का आरुषी संसथान ने बदली तस्वीर
स्तुति की कोई औपचारिक स्कूली शिक्षा (Formal Schooling) नहीं हुई, लेकिन उनके सीखने का जज्बा कभी कम नहीं हुआ। साल 2019 में उनके पिता का ट्रांसफर भोपाल हो गया। यहाँ उनकी मुलाकात 'आरुषि' (Arushi) संस्था से हुई, जो उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
होटल ताज के साथ विशेष कोलैबोरेशन
आरुषि संस्था ने साल 2019 में होटल ताज के साथ एक विशेष कोलैबोरेशन किया। इसके तहत स्तुति को वहां वर्कशॉप करने का सुनहरा मौका मिला। अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति और नई चीजें सीखने की ललक के कारण, स्तुति ने वहां अपनी एक खास जगह बनाई।
"वह स्वभाव से ही बहुत जिज्ञासु थीं और हमेशा नई चीजें सीखना चाहती थीं।"
जज्बा रहे तो किसी भी बाधा को पार करना कठिन नहीं
आज स्तुति की यह यात्रा उन सभी परिवारों के लिए एक मिसाल है, जो किसी न किसी शारीरिक या मानसिक चुनौती से जूझ रहे हैं। उसका जज्बा सिखाता है कि यदि सही समय पर सहारा और अवसर मिले, तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती।
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