जबलपुर। हाईकोर्ट ने शहडोल निवासी एक महिला की याचिका को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी है कि ...
जबलपुर। हाईकोर्ट ने शहडोल निवासी एक महिला की याचिका को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी है कि बिना उचित साक्ष्य (Evidence) के बहुविवाह को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आदिवासी परंपरा का तर्क देकर कोई भी महिला अपने पति की संपत्ति या सरकारी नौकरी में अधिकार का दावा नहीं कर सकती।
कोर्ट ने परंपरा का तर्क दरकिनार किया
अदालत ने कहा कि किसी समुदाय में बहुविवाह की परंपरा होना एक बात है, लेकिन कानूनी हक पाने के लिए उस विवाह का ठोस प्रमाण होना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता महिला ने खुद को दूसरी पत्नी बताते हुए पति की संपत्ति और नौकरी पर हक जताया था, जिसे कोर्ट ने ठोस साक्ष्यों के अभाव में खारिज कर दिया।
मौखिक परंपरा काफी नहीं, साक्ष्य जरूरी
कोर्ट के अनुसार, संपत्ति या अनुकंपा नियुक्ति जैसे मामलों में दावा करने के लिए महज मौखिक परंपरा काफी नहीं है। इसके लिए विवाह के वैध दस्तावेज या पुख्ता सबूत होने चाहिए।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला शहडोल की एक महिला से जुड़ा है जिसने अदालत में याचिका दायर कर अपने पति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति और नौकरी में हिस्सेदारी मांगी थी। महिला का तर्क था कि वह आदिवासी समुदाय से है और उनके समाज में एक से अधिक विवाह करने की परंपरा है, इसलिए वह मृत व्यक्ति की वैध पत्नी है।
परंपरा के अलावा तथ्य और प्रमाण का आधार जरूरी
इधर, कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि महिला के पास अपने विवाह को साबित करने के लिए उचित साक्ष्य नहीं थे। कोर्ट ने टिप्पणी की कि आदिवासी रीति-रिवाजों का सम्मान है, लेकिन जब बात कानूनी उत्तराधिकार की आती है, तो न्याय प्रक्रिया केवल परंपराओं के आधार पर नहीं बल्कि तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर चलती है।
कोर्ट ने कहा- बिना उचित साक्ष्य के बहुविवाह को मान्यता नहीं दी जा सकती। केवल परंपरा का हवाला देकर कोई महिला पति की संपत्ति या नौकरी में अधिकार प्राप्त नहीं कर सकती।
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