मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की प्रशासनिक न्यायाधीश की युगलपीठ (Division Bench) ने कर्मचारियों के हित में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की प्रशासनिक न्यायाधीश की युगलपीठ (Division Bench) ने कर्मचारियों के हित में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी काम करने का इच्छुक है और अपनी सेवाएं देने के लिए तैयार है, तो ऐसी स्थिति में विभाग या नियोक्ता उन पर 'नो वर्क नो पे' (काम नहीं तो वेतन नहीं) का सिद्धांत लागू नहीं कर सकता।
वेतन का हकदार होगा, कर्मचारी की गलती नहीं
यदि किसी कर्मचारी को प्रशासनिक कारणों या विभाग की गलती की वजह से काम करने से रोका जाता है, तो वह वेतन का हकदार होगा। कोर्ट ने माना कि अगर कर्मचारी कार्यस्थल पर उपस्थित है और काम करना चाहता है, लेकिन उसे काम नहीं दिया जा रहा, तो इसमें कर्मचारी की कोई गलती नहीं है।
सरकार दे वेतन व पूरा लाभ
ऐसे मामलों में कर्मचारी को उस अवधि का पूरा वेतन और अन्य सेवा लाभ दिए जाने चाहिए, क्योंकि उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध काम से दूर रखा गया था। यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत है जिन्हें अक्सर तकनीकी या प्रशासनिक उलझनों के कारण काम से बाहर रखा जाता है और फिर उनका वेतन काट लिया जाता है। कोर्ट के इस आदेश से अब स्पष्ट है कि नियोक्ता की गलती का खामियाजा कर्मचारी को नहीं भुगतना पड़ेगा।
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