नई दिल्ली/मुरैना। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में अवैध रेत खनन माफियाओं के बढ़ते दुस्साहस और एक वन रक्षक की नृशंस हत्या पर सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई है।
नई दिल्ली/मुरैना। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में अवैध रेत खनन माफियाओं के बढ़ते दुस्साहस और एक वन रक्षक की नृशंस हत्या पर सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य प्रशासन की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़े किए हैं।
राज्य सरकार के अधिकारी अंधे हैं
कोर्ट ने सख्त लहजे में पूछा, "क्या राज्य के अधिकारी अंधे हैं? यह सब आपकी नाक के नीचे हो रहा है।" बेंच ने यहाँ तक टिप्पणी की कि या तो सरकार अवैध खनन रोकने में पूरी तरह नाकाम रही है या फिर इसमें अधिकारियों की मिलीभगत है।
माफिया ने की पुल की नींव तक खुदाई
कोर्ट को सूचित किया गया कि चंबल नदी पर बने पुल के 34 में से 8 खंभों (Pillars) को अवैध खनन से भारी नुकसान पहुँचा है। माफियाओं ने खंभों के नीचे से लगभग 25 से 50 फीट तक रेत निकाल ली है। इस पर जस्टिस मेहता ने कहा, "क्या सरकार तब रिपोर्ट देगी जब पुल गिर जाएगा और लोग मर जाएंगे?"
वन रक्षक हरकेश गुर्जर को कुचल कर मार डाला
हाल ही में मुरैना में अवैध रेत से लदे ट्रैक्टर को रोकने की कोशिश कर रहे वन रक्षक हरकेश गुर्जर को माफियाओं ने ट्रैक्टर से कुचलकर मार दिया था। कोर्ट ने इसे बेहद गंभीर स्थिति बताते हुए जांच की स्टेटस रिपोर्ट मांगी है।
एएसजी ने कहा- फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाई गई
राज्य सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने दलील दी कि एक फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी बनाई गई है और जांच जारी है। उन्होंने यह भी कहा कि माफियाओं के पास वन विभाग की तुलना में अधिक उन्नत हथियार हैं।
कोर्ट तल्ख, सरकार का होने का क्या मतलब है
इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि अगर सरकार के पास हथियार नहीं हैं या वह अपने अधिकारियों की रक्षा नहीं कर सकती, तो सरकार के होने का क्या अर्थ है? कोर्ट ने सुझाव दिया कि प्रभावित क्षेत्रों में हाई-रिजोल्यूशन कैमरे और जीपीएस मॉनिटरिंग सिस्टम लगाए जाने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: लिया संज्ञान
सुप्रीम कोर्ट चंबल अभयारण्य में अवैध खनन और जलीय जीवों (जैसे घड़ियाल और डॉल्फिन) के आवास को हो रहे नुकसान पर स्वत: संज्ञान (Suo Motu) लेकर सुनवाई कर रहा है। कोर्ट ने खनन माफियाओं की तुलना "डकैतों" से की है जो न केवल पर्यावरण बल्कि कानून व्यवस्था के लिए भी बड़ा खतरा बन चुके हैं।
अवैध गतिविधि बर्दाश्त नहीं
चंबल अभयारण्य के संरक्षण और कानून के शासन को बनाए रखने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख को दर्शाता है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि वह संरक्षित क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की अवैध गतिविधि को बर्दाश्त नहीं करेगा।
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