नेपाल में फैली हिंसा पर विराम लगता नजर आ रहा है. क्यों कि वर्चुअल बैठक में नेपाल ने अंतरिम प्रधानमंत्री चुन लियाहै.जेन-जी के युवाओं की पसंद बनी सुशीला कार्की. सेना से मिलने के बाद जल्द होगी ताजपोशी.
नकुल जैन, नोएडा
नेपाल में सत्ता के तख्तापलट के बाद पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री चुन लिया गया है ..प्रधानमंत्री के चयन के लिए जेन-जी के 5000 हजार युवाओं ने वर्चुअल बैठक के दौरान वोट डाले..जिनमें सबसे ज्यादा वोट सुशीला कार्की के पक्ष में पड़े..उन्हें कुल 58 फीसदी वोट हासिल हुए..वहीं युवाओं में अपनी खास पहचान रखने वाले बालेन शाह को 32 फीसदी वोट मिले..और वह दूसरे नंबर पर रहे..वहीं अतंरिम प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद नेपाल की पूर्व चीफ जस्टिस ने भारतीय मीडिया के साथ बातचीत की. बातचीत के दौरान वह काफी उत्साहित नजर आई..साथ ही उन्होंने भारत के साथ नेपाल के खास संबंधों को लेकर भी चर्चा की ..और पीएम मोदी की तारीफ में कसीदे भी पढ़े..वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री पद से इस्तीफे के बाद केपी ओली ने भारत के खिलाफ बयानबाजी की..उन्होंने कहा कि जेन-जी आंदोलन के पीछे भारत का हाथ है..भारत कभी नहीं चाहता था कि वह प्रधानमंत्री रहे..क्यों कि उन्होंने अयोध्या को लेकर विवादित टिप्पणी की थी...
कौन है सुशीला कार्की
सुशीला कार्की का जन्म सन् 1952 में नेपाल के बिराट नगर में हुआ था..कानूनी दाव पेंच में रुचि रखने वाली कार्की बचपन से ही अपनी हाजिरजवाबी और बेबाकी के लिए जानी जाती थी..उन्होंन स्नातक की पढ़ाई नेपाल से की जिसके बाद वह मास्टर करने के लिए बनारस चली गई..जहां वह पढ़ाई करने के साथ-साथ अपना दिल भी दे बैठी..बता दें कि कॉलेज के दौरान उनकी मुलाकात दुर्गा प्रसाद सुवेदी से हुई..जो कि उन दिनों नेपाली कांग्रेस के चर्चित नेताओं में गिने जाते थे..धीरे धीरे उनकी मुलाकातें का सिलसिला बढ़ता चला गया.और फिर एक दिन दोनों ने शादी कर ली..उन्होंने इन सब चीजों का जिक्र अपनी आत्मकथा न्याय में भी किया है..जिसका प्रकाशन साल 2018 में किया गया था..वहीं उनके करियर की बात की जाए तो साल 1979 में वकालत के साथ उन्होंने कानून की दुनिया में कदम रखा..जहां उन्हें अनेकों सफलता भी प्राप्त हुई,,वहीं उन्होंने कुछ समय नेपाल के धरान में बतौर सहायक अध्यापक के पद पर भी नौकरी की..लेकिन वह अदालत और वकालत के साथ जुड़ी रही..साल 2009 में उन्हें नेपाल की सुप्रीम कोर्ट में एड हॉक जज नियुक्त किया गया..वहीं 2010 में वह स्थायी हुई..और 2016 में उन्होंने नेपाल की पहली चीफ जस्टिस होने का गौरव हासिल किया..वहीं साल 2017 में नेपाल की मुख्य विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस के साथ उनकी कानूनी जंग भी छिड़ी..इस दौरान उन पर जबरदस्त तरीके से राजनीतिक दबाव बनाया गया..और उन्हें झुकाने की पुर-जोर कोशिश हुई..लेकिन इन सबके बावजूद वह निर्भिकता से डटी रही और चुनौती का सामना करती रही..
क्या सुशीला कार्की के आने से भारत-नेपाल के रिश्ते सुंधरेंगे
सुशीला कार्की की ताज-पोशी होने के बाद भारत और नेपाल के संबंधों में एक बार फिर से नजदीकियां आने की उम्मीद लगाई जा रही है.. क्यों कि सुशीला कार्की शुरु से ही पीएम मोदी की मुरीद रही है..वह कई बार सार्वजनिक रुप से पीएम मोदी के काम-काज को लेकर तारीफ कर चुकी है..वहीं कल भी जब उनके अंतरिम प्रधानमंत्री चुने जाने की बात सामने आई तो तभी वह भारत को लेकर सकरात्मक नजर आई...उन्होंने भारतीय मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि भारत के साथ नेपाल के रिश्ते खास है..और इस कठिन समय में नेपाल को भारत का साथ जरुरी है..उनके बयान से साफ जाहिर होता है कि उनके अंतरिम प्रधानमंत्री बनने के बाद फिर से भारत और नेपाल के रिश्ते मजबूत होने जा रहे हैं..यदि ऐसा होता है तो भारत के दृष्टिकोण से भी खास होगा..क्यों कि नेपाल के साथ चीन की नजदीकियों ने सीमा सुरक्षा को लेकर भारत की चिंताएं बढ़ा दी थी..
सत्ता से बेदखल होने के बाद ओली ने उगला जहर
नेपाल में चले जेन-जी आंदोलन के बाद ओली सरकार का पूरी तरह से तख्तापलट हो गया है..नेपाल के लोगों में सरकार के प्रति इतना रोष था कि नेपाल सरकार के मंत्रियों को सेना की शरण लेनी पड़ी..आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारी नेपाल सरकार के मंत्रियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटते हुए नजर आए..वहीं पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली को भी अंडरग्राउंड होकर अपनी जान बचानी पड़ी..साथ ही प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा भी देना पड़ा..वहीं अब हाथ से सत्ता चले जाने के बाद वह इसको लेकर भारत को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं..उन्होंने अपनी पार्टी के महासचिव को पत्र लिखकर कहा है कि..यदि वह अयोध्या और लिपुलेख को लेकर विरोध नहीं करते तो वह पद पर बने रहते..उनकी बात में कितनी सच्चाई है..इसका तो पता नहीं..लेकिन सत्ता से जो बेदखल होने की टीस है..वो उनकी बातों में साफ नजर आ रही है..ओली ने जेन-जी आंदोलन को लेकर भी भारत पर बड़े आरोप लगाए हैं..उनका कहना है कि जेन-जी युवाओं को आक्रोशित करने के पीछे भारत का हाथ था..उनके उकसावे और बढ़ावे के चलते ही नेपाल में इतनी बड़ी हिंसा और अराजकता हुई है..उन्होंने नेपाल की जनता को भारत से सावधान रहने के लिए भी आगाह किया है..
भारत के खिलाफ ओली के बयान के क्या है मायने
केपी ओली और उसकी पार्टी की विचारधारा कम्यूनिस्ट वादी है..औऱ नेपाली कम्यूनिस्ट हमेशा भारत के खिलाफ रहते हैं..जिसके चलते केपी ओली का सुर भी भारत के विरोध में ही रहता है..वहीं ओली जब भी नेपाल के प्रधानमंत्री बने हैं..वह हमेशा भारत के खिलाफ रहे हैं..वह भारत को नीचा दिखाने के लिए भारत के बजाए चीन को तरजीह देते रहें हैं..वहीं साल 2020 में तो उन्होंने सारी हदें पार करते हुए.. भारत-नेपाल के बीच विवादों में घिरे कुछ क्षेत्रों को मानचित्र में नेपाल के अंदर दिखाकर संसद तक में मंजूरी दिला दी थी..जिसके बाद भारत और नेपाल के बीच तनाव और भी ज्यादा बढ़ गया था..वहीं राम जन्मभूमि अयोध्या को लेकर भी ओली विवादित टिप्पणी कर चुके हैं..इन सभी कारणों से ओली को लगता है कि भारत ने ओली से बदला लेने के लिए नेपाल में राजनीतिक संकट पैदा करके,उसकी सरकार गिराने का षड़्यंत्र रचा है..खैर उनके दावों में कितनी सच्चाई है.. इसको लेकर तो कुछ भी सही से नहीं का जा सकता..हां, लेकिन इतना जरुर है कि.. नेपाल की सत्ता में ओली के आने से भारत और नेपाल के रिश्ते जरुर कमजोर जरुर हुए थे.वहीं चीन के साथ नेपाल की नजदीकियां होने से भारत की अपनी सीमाओं को लेकर चिताएं भी बढ़ गई थी..क्यों कि अगर भारत और नेपाल के भौगोलिक परिवेश की बात की जाए तो दोनों देशों के बीच तीन जगहों से सीमाएं लगती है.. यदि ऐसे में चीन और नेपाल लगातार एक-दूसरे के करीब आते रहते..तो भारत के लिए नई चुनौतियां पैदा हो सकती थी..क्यों कि भारत और चीन के बीच सीमाओं को लेकर पहले से ही अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में तनाव चल रहा है..तो ऐसे में भारत कभी नहीं चाहेगा कि..भारत एक और नई उलझन में उलझे..वहीं दूसरी ओली भारत के कुछ हिस्सों को लेकर भी नेपाल में होने का दावा करते हैं..जिसको लेकर भी भारत आपत्ति जता चुका है..वहीं ओली के द्वारा अयोध्या औऱ भगवान राम का जन्म नेपाल में होने की बात करना भी..भारत के लिए निराशाजनक था..लेकिन इन सब चीजों से ये कहीं भी सिद्द नहीं होता कि भारत ने ही नेपाल के अंदर आंतरिक कलह का षड़्यंत्र रचा हो...क्यों कि वहां की जनता भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, मंहगाई और नेपो किड्स जैसे मुद्दों से बुरी तरह से परेशान हो चुकी थी..जिसके चलते वो सरकार के खिलाफ इतनी आक्रोशित हो चली थी कि उनके विद्रोह को सुलगाने के लिए बस एक चिंगारी ही काफी थी..वहीं उस चिंगारी काम ओली की तरफ से सोशल ऐप पर लगी पाबंदी ने किया..इस पाबंदी के बाद नेपाल के आम नागरिक और जेन-जी संगठन के युवा पूरी तरह से भड़क उठे..और फिर देखते ही देखते कुछ ही समय में पूरा नेपाल दहल गया..और साथ ही इस जनआक्रोश की आग में ओली समेत उनके तमाम मंत्रिमंडल की कुर्सियां भी खाक हो गई..वहीं अब वह अपनी तानाशाही और नाकामियों का ठिकरा बिना किसी सबूत के भारत के नाम मढ़ने का काम कर रहे हैं..जो कि एक बेईमानी सा नजर आ रहा है..