भारत सहित पूरी दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) की लोकप्रियता दिनोदिन बढ़ रही है। तमाम कंपनियों की AI निर्भरता बढ़ती जा रही है।
एआई की गलत जानकारी से रद्द हुए बड़े कॉन्ट्रैक्ट
भारत सहित पूरी दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) की लोकप्रियता दिनोदिन बढ़ रही है। तमाम कंपनियों की AI निर्भरता बढ़ती जा रही है। कंपनियां AI का प्रयोग बढ़ाते हुए अपने प्रतिष्ठानों से कामगारों की छुट्टी कर रही हैं। लेकिन "एआई" गलत और फेक न्यूज दे रहा है जिससे कई कंपनियों के आर्डर कैंसिल हो रहे हैं और उन्हें करोड़ों का घाटा उठाना पड़ा है। अमेरिका के मीडिया हाउस "न्यूयार्क टाइम्स" ने से खुलासा अपनी रिपोर्ट में किया है। "दैनिक भास्कर" AI "न्यूयार्क टाइम्स" के सौजन्य से विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है।
वुल्फ रिवर इलेक्ट्रिक को भारी नुकसान
"न्यूयार्क टाइम्स" की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में मिनेसोटा की सोलर कंपनी "वुल्फ रिवर इलेक्ट्रिक" के ग्राहक पिछले साल धड़ाधड़ कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने लगे। 3 लाख 88 हजार डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट रद्द हुए। नतीजा ये हुआ कि कंपनी को करीब 200 करोड़ रु. का नुकसान हुआ। कंपनी ने इसकी पड़ताल की तो पता चला कि ऐसा AI की भ्रामक जानकारी के कारण हुआ।
कंपनी का गूगल पर मानहानि का दावा
पड़ताल करने पर ग्राहकों ने बताया, 'गूगल पर पढ़ा कि कंपनी ने धोखाधड़ी के केस में सरकार से समझौता किया है।' हालांकि कंपनी पर ऐसा कोई केस था ही नहीं। इसके बावजूद कंपनी इस झूठ के असर को समाप्त कराने के प्रयासों में नाकाम रही। बाद में कंपनी ने इस घाटे की भरपाई लिए गूगल पर मानहानि का केस कर 900 करोड़ रु. मुआवजा मांगा। गूगल ने इस प्रकरण पर कहा कि 'नई प्रौद्योगिकी में गलतियां संभव हैं। गलती का पता चलते ही सुधार किया गया। हालांकि "वुल्फ रिवर" की पड़ताल से पता चला है कि कंपनी खिलाफ के मुकदमा विचाराधीन है।
कंपनी "वुल्फ रिवर इलेक्ट्रिक" के संस्थापक जस्टिन नील्सन कहते हैं, 'हमारी साख वर्षों में बनी है। इस झूठ के बाद ग्राहकों का भरोसा जीतना नामुमकिन है। यह नहीं रुका तो कंपनी बंद हो सकती है।'
AI की भ्रामक जानकारी के कारण अमेरिका में दो वर्ष में ऐसे 6 मुकदमे दायर हुए हैं। इनमें आरोप है कि एआई टूल्स ने झूठी और नुकसानदायक बातें फैलाई। अदालतों के समक्ष कानूनी सवाल है कि अगर मशीन झूठ फैलाए तो जिम्मेदारी किसकी होगी ?
कानूनी सवाल—एआई झूठ बोले तो जिम्मेदार कौन?
"सिराक्यूज यूनिवर्सिटी" की प्रोफेसर नीना ब्राउन कहती हैं कि एआई के झूठ के लिए अगर कोर्ट किसी कंपनी को जिम्मेदार ठहराती है तो बहुत से नए केस खुल जाएंगे। ऐसे में, कंपनियां खतरा भांपकर ट्रायल से पहले ही समझौता कर लेंगी। "मेटा" ने रॉबी स्टारबक के साथ ऐसा ही किया था। इन्फ्लुएंसर स्टारबक ने 2024 के मुकदमे में कहा था कि मेटा एआई चैटबॉट लामा ने एक पोस्ट में लिखा था कि वह 6 जनवरी 2021 के अमेरिकी संसद दंगे में शामिल था। जबकि घटना के दिन वह अपने घर पर था। मेटा ने कोर्ट केस से पहले ही स्टारबक को एआई टीम में सलाहकार बना लिया। मेटा ने कहा, 'हमने रॉबी के साथ काम करके एआई की सटीकता और निष्पक्षता में सुधार किया है।' बाद में स्टारबक ने गूगल के एल्गोरिद्म में राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगाते हुए करीब 125 करोड़ रुपए का दावा ठोका। 2023 में जॉर्जिया में एक रेडियो होस्ट मार्क वॉल्टर्स ने ओपनएआई पर केस किया था। चैटजीपीटी ने एक रिपोर्टर को झूठी जानकारी दी थी कि वॉल्टर्स पर गबन का आरोप है। उसके वकील की दलील है, 'फ्रेंकेंस्टाइन (एक काल्पनिक वैज्ञानिक) का बनाया राक्षस लोगों को मारेगा तो वह पल्ला नहीं झाड़ सकता।' लेकिन कोर्ट ने केस खारिज कर दिया।
एआई की भ्रामक खबर ने सिर्फ किसी कंपनी को ही नहीं एक डीजे पर भी दुष्कर्म के झूठे आरोप लगाकर उसका चरित्र हनन किया गया। आयरलैंड के डीजे डेव फैनिंग को एक दिन पता चला कि "माइक्रोसॉफ्ट" के एमएसएन पोर्टल पर एक खबर में उनकी फोटो के साथ लिखा था कि उन पर यौन शोषण के आरोप हैं। यह खबर भारत की एक वेबसाइट ने "एआई" से लिखवाई थी। साथ में फैनिंग की फोटो लगा दी। माइक्रोसॉफ्ट ने बिना जांचे लेख एमएसएन पर डाल दिया। फैनिंग ने माइक्रोसॉफ्ट और वेबसाइट पर मुकदमा कर रखा है। उन्होंने कहा, 'इसने मुझे भीतर तक हिला दिया।'
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