NCERT की कक्षा 9 की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तक में रामायण, महाभारत और चोल वंश के सेंगेल के जरिए भारत की प्राचीन शासन परंपराओं और संवैधानिक मूल्यों को रेखांकित किया गया है।
नई दिल्ली। एनसीईआरटी (NCERT) ने कक्षा 9 की संशोधित सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के जरिए देश के युवाओं को प्राचीन भारतीय शासन प्रणालियों और सांस्कृतिक विरासत से रूबरू कराने की दिशा में एक अहम कदम उठाया है। सोमवार को जारी इस नई पुस्तक—'अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड द बियॉन्ड'—में इस बात पर विशेष प्रकाश डाला गया है कि कैसे भारत ने औपनिवेशिक शासन के दौर के बावजूद अपनी प्राचीन संस्थाओं और शासन की परंपराओं को सहेज कर रखा है।
संसदीय लोकतंत्र और प्राचीन जड़ें
पुस्तक के अध्याय 4, जिसका शीर्षक 'शासन और लोक नीति' (Governance and Public Policy) है, में यह विस्तार से समझाया गया है कि भारत में शासन का विकास किस प्रकार हुआ है। यह अध्याय बताता है कि हालांकि भारतीय शासन व्यवस्था पर औपनिवेशिक विरासत का प्रभाव रहा है, लेकिन इसने अपनी ऐतिहासिक और पारंपरिक जड़ों को भी गहराई से संजोए हुए है।
अध्याय में स्पष्ट किया गया है, "भारत औपनिवेशिक काल की ऐतिहासिक विरासत से अछूता नहीं है। हालांकि, भारत दो महत्वपूर्ण मायनों में अलग दिखता है। पहला, औपनिवेशिक शासन का अनुभव करने वाले कई समाजों के विपरीत, भारत ने अपने औपनिवेशिक काल से पहले के संस्थानों और शासन की परंपराओं के अधिकांश ज्ञान को ग्रंथों और प्रथाओं के माध्यम से संरक्षित रखा है।" पुस्तक इस बात पर जोर देती है कि स्वतंत्र भारत के दूरदर्शी नेताओं ने इसी गौरवशाली भावना के अनुरूप अपने संविधान का निर्माण किया।
राम राज्य और सुशासन के आदर्श
नई पाठ्यपुस्तक में महात्मा गांधी के 'राम राज्य' के दृष्टिकोण को प्रमुखता से शामिल किया गया है। पुस्तक के अनुसार, राष्ट्रपिता के ये विचार इस बात की सामूहिक कल्पना को दर्शाते हैं कि राम राज्य सुशासन के सर्वोत्तम और जीवंत उदाहरणों में से एक है।
इस खंड में उल्लेख किया गया है, "राम राज्य सत्यनिष्ठा, पारदर्शिता, करुणा, कल्याण और शासन एवं सार्वजनिक नीति में जन-केंद्रित दृष्टिकोण के सिद्धांतों पर आधारित है।" पुस्तक आगे जोड़ती है कि रामायण और 16वीं शताब्दी के महाकाव्य 'रामचरितमानस' में वर्णित राम राज्य, प्राचीन काल से लेकर आज तक भारतीयों के लिए एक आदर्श सामूहिक जीवन का प्रतीक रहा है।
महाभारत और शासन का पवित्र दायित्व
केवल रामायण ही नहीं, बल्कि इस अध्याय में महाभारत के उन प्रसंगों का भी विश्लेषण किया गया है जिन्होंने आधुनिक भारतीय शासन को आकार दिया है।
पुस्तक के अनुसार, "वैदिक काल से लेकर रामायण और महाभारत तक, भारतीय परंपरा ने शासन को केवल सत्ता के प्रयोग का साधन मात्र नहीं, बल्कि एक पवित्र दायित्व के रूप में देखा है।" सुशासन का आकलन केवल शासक के अधिकार के बल पर नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त शांति, समृद्धि, न्याय और नागरिकों की खुशहाली के आधार पर किया जाता था।
बदले आदर्श वाक्य और ऐतिहासिक प्रतीक
भारतीय संविधान और संस्थाओं द्वारा अपनाए गए पारंपरिक प्रतीकों और वाक्यों के बदलाव को भी पुस्तक में रेखांकित किया गया है। उदाहरण के तौर पर, ब्रिटिश काल में 'ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया' द्वारा 'हेवेन्स लाइट, अवर गाइड' (Heaven's Light, Our Guide) जैसे आदर्श वाक्यों का प्रयोग होता था, लेकिन स्वतंत्रता के बाद हमने मुंडक उपनिषद से प्रेरणा लेते हुए 'सत्यमेव जयते' को अपना राष्ट्रीय आदर्श वाक्य बनाया।
इसी तरह, सर्वोच्च न्यायालय का आदर्श वाक्य 'यतो धर्मस्ततो जयः' महाभारत से लिया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है—'जहां धर्म है, वहीं विजय है।' पुस्तक मानती है कि ये परिवर्तन केवल प्रतीकात्मक नहीं हैं, बल्कि यह उन मूल मूल्यों और आदर्शों को दर्शाते हैं जिन पर देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को चलाने की जिम्मेदारी है।
सेंगेल और चोल साम्राज्य की विरासत
अध्याय के अंत में ऐतिहासिक 'सेंगेल' (Sengol) की विरासत पर भी विशेष चर्चा की गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वर्ष 2023 में नए संसद भवन में स्थापित किए गए इस राजदंड को पुस्तक ने "शासन और सुशासन का सांस्कृतिक प्रतीक" बताया है।
पुस्तक में उल्लेख किया गया है कि शासन के इस पवित्र प्रतीक का उपयोग एक हजार वर्ष से अधिक पुराने चोल साम्राज्य के काल से होता आ रहा है। इतिहास के पन्नों को पलटते हुए इसमें याद दिलाया गया है कि 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को देश की आजादी के ऐतिहासिक क्षण में पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने तमिलनाडु के अधीनम संतों (एक प्राचीन शैव परंपरा) से यही सेंगेल प्राप्त किया था।
(भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)
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