अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार, 26 अगस्त 2026 की सुबह करीब 8:37 मिनट पर तिब्बत में गोसाईंकुंड से 47 किलोमीटर उत्तर में 4.4 तीव्रता का भूकंप आया था।
शिवानी सिंह
नोएडा। हिमालय जितना सुंदर है उतना ही भयावह भी है। नेपाल और तिब्बत की सीमा पर रसुवा जिले में भोटेकोशी नदी की यह प्राकृतिक आपदा न तो पहली आपदा है और न ही अंतिम । हिमालय हमेशा से बेहद संवेदनशील पर्वत रहा है। अभी इसकी ऊँची चोटियों पर सैकड़ों ऐसी झीलें हैं जो कभी भी किसी बड़ी आपदा का कारण बन सकती हैं। इनके चारों तरफ की ऊंची पहाड़ियों पर बर्फ के विशालकाय ग्लेशियर हैं। भूकंप की दृष्टि से भी पूरा हिमालय सर्वोच्च संवेदनशील है। इस पूरे इलाके में हमेशा छोटे बड़े भूकंप आते रहते हैं। इन्हीं भूकंपों या आतिवृष्टि या अन्य मानवीय हस्तक्षेप के कारण भूस्खलन और हिमस्खलन का खतरा बना रहता है। यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा। हालांकि इसके विस्तृत कारणों की जांच व्यापक रिसर्च के बाद ही सामने आएगी, लेकिन यह तय है कि पूरा क्षेत्र भूगर्भीय हलचलों के कारण बेहद संवेदनशील और खतरनाक है।
फ्लैश फ्लड ने मचा दी तबाही
नेपाल के रसुवा जिले में भोटेकोशी नदी में अचानक आई एक भयंकर बाढ़ ने भारी तबाही मचा दी है। इस अचानक आए जलप्रलय ने आसपास के रिहायशी इलाकों और बाजारों को अपनी चपेट में ले लिया है, जिससे हर तरफ अफरा-तफरी का माहौल बन गया है। इस आपदा के पीछे की असली वजह क्या है? शुरुआती जांच रिपोर्टों के मुताबिक, इस भयंकर बाढ़ का मुख्य कारण आम बारिश बिल्कुल नहीं, बल्कि ऊंचे पहाड़ों एक भयावह प्राकृतिक आपदा है। नेपाल-तिब्बत सीमा पर अचानक आए एक बड़े हिमस्खलन की वजह से 'लेंडे नदी' (Lhende River) का प्राकृतिक बहाव पूरी तरह रुक गया था। जब ग्लेशियर अचानक टूटा, तो भारी मात्रा में झील के मलबे के साथ पानी एक प्रचंड वेग से विनाशकारी फ्लैश फ्लड के रूप में नदीं में आ गया। इसके दृश्य भयावह थे।
फ्लड से 20 मिनट पहले 47 किलोमीटर दूर आया था भूकंप
अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार, 26 अगस्त 2026 की सुबह करीब 8:37 मिनट पर तिब्बत में गोसाईंकुंड से 47 किलोमीटर उत्तर में 4.4 तीव्रता का भूकंप आया था। इसके लगभग 20-25 मिनट बाद (सुबह 9:00 बजे) नेपाल के रसुवा जिले में हिमस्खलन हुआ और अचानक प्रचंड बाढ़ आ गई। नेपाल सरकार के विदेश मंत्रालय और वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तबाही के पीछे भूकंप का बहुत बड़ा हाथ है। भूकंप के झटकों से बर्फ खिसकी, पानी का दबाव बढ़ा और झील में रुका हुआ ग्लेशियर टूट गया, जिससे सारा पानी किसी भयावह जल प्रलय क तरह भोटेकोशी नदी में आ गया। चूंकि रसुवा और आसपास के इलाकों में धूप खिली हुई थी और बिल्कुल बारिश नहीं हो रही थी, इसलिए विशेषज्ञ इसे भूकंप की वजह से हुआ ग्लेशियर आउटबर्स्ट/एवलांच (GLOF) मान रहे हैं।"
GLOF (ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड) क्या है और यह कैसे होता है?
GLOF का मतलब है 'हिम झील का अचानक फटना या बह जाना'।
• ग्लोबल वार्मिंग और लगातार बढ़ते तापमान की वजह से ऊंचे पहाड़ों पर मौजूद ग्लेशियर पिघलने लगते हैं। इनका पानी पहाड़ों के बीच एक प्राकृतिक कटोरे जैसी झील में जमा होने लगता है। इन झीलों के किनारे मिट्टी, पत्थरों और जमी हुई बर्फ (Moraine) के बने कच्चे बांधों से टिके होते हैं।
• जब कभी भूकंप के झटके लगते हैं, भारी हिमस्खलन होता है, या पानी का दबाव बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, तो यह कच्चा प्राकृतिक बांध अचानक टूट जाता है। इसके टूटने से काफी लीटर पानी एक साथ बहुत तेज गति से नीचे की ओर बहने लगता है, जिससे निचले इलाकों में कुछ ही मिनटों में भयंकर बाढ़ आ जाती है। यह पर्यावरण, इंसानी जिंदगियों और रास्तों-पुलों को पूरी तरह तबाह कर देता है।
हिमालयी क्षेत्र की 47 'अत्यधिक खतरनाक' हिम झीलें और हॉटस्पॉट
• नेपाल से सटे तिब्बत में हैं बेहद 47 खतरनाक हिम झीलें:
अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वत विकास केंद्र (ICIMOD) और नेपाल सरकार के विस्तृत अध्ययन के मुताबिक, नेपाल और उसके सीमावर्ती तिब्बती इलाके में 47 ऐसी हिम झीलें हैं जो "अत्यधिक खतरनाक" (Potentially Dangerous) श्रेणी में आती हैं।
• 2,000+ हिम झीलें:
अकेले नेपाल में 2,000 से अधिक हिम झीलें मौजूद हैं, जिनका जलस्तर लगातार बढ़ रहा है।
• हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र:
भारत, नेपाल, भूटान, चीन और पाकिस्तान के पूरे हिमालयी क्षेत्र में करीब 200 से अधिक हिम झीलों को उच्च जोखिम (High Risk) वाले बिंदुओं के रूप में चिन्हित किया गया है।
• नेपाल की प्रमुख हाई-रिस्क हॉटस्पॉट:
1. त्शो रोल्पा (Tsho Rolpa): नेपाल की सबसे बड़ी और खतरनाक हिम झीलों में से एक (रोलवालिंग घाटी)।
2. इम्जा त्शो (Imja Tsho): एवरेस्ट क्षेत्र में तेजी से फैलती विशाल झील।
3. ठुलागी और फुक्सुंडो: गंडकी और कर्णाली बेसिन की संवेदनशील झीलें।
4. भोटे कोशी व कोशी बेसिन: तिब्बत-नेपाल सीमा का वह इलाका जहाँ हिमस्खलन और झील टूटने से निचले इलाकों में सीधा खतरा रहता है।
तबाही लाने वाले तीन मुख्य अति-संवेदनशील केंद्र और श्रेणियां
वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालयी क्षेत्र में ऐसी आपदाओं के लिए मुख्य रूप से तीन बातें जिम्मेदार हैं:
1. एक्टिव सीस्मिक फॉल्ट ज़ोन (भूकंपीय दरारें):
भारतीय और eurasion टेक्टोनिक प्लेटों के आपस में टकराने से बने फॉल्ट केंद्र, जैसे मेन फ्रंटल थ्रस्ट (MFT), मेन बाउंड्री थ्रस्ट (MBT) और मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT)। ये नेपाल, उत्तराखंड, हिमाचल और पूर्वोत्तर भारत से गुजरते हैं और तेज भूकंपों का मुख्य कारण बनते हैं।
2. अति-संवेदनशील भूस्खलन हॉटस्पॉट्स (Landslide Prone Zones):
भूकंप या भारी बारिश से पहाड़ दरकने और नदियां ब्लॉक होने के खतरे वाले क्षेत्र—जैसे नेपाल की भोटे कोशी, त्रिशूली और काली गंडकी घाटियाँ; तिब्बत-नेपाल सीमा के रसुवागढ़ी, तातोपानी और तिमुरे बाज़ार; तथा भारतीय हिमालय में उत्तराखंड (जोशीमठ, उत्तरकाशी), हिमाचल (किन्नौर, कुल्लू) और सिक्किम का उत्तरी हिस्सा।
3. ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) केंद्र:
भूकंप या भूस्खलन के कारण अचानक टूटने वाली खतरनाक झीलें (जैसे ICIMOD द्वारा चिन्हित 47 उच्च-जोखिम वाली झीलें)।
@NDRRMA_Nepal द्वारा शेयर किए गए वीडियो और तस्वीरों के मुताबिक, स्टीमसन सेंटर की मदद से मिली प्लैनेट लैब्स (Planet Labs) की सैटेलाइट तस्वीरों से यह साफ पता चलता है कि रसुवा में भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ ने स्याफ्रुबेशी से लेकर देवीघाट तक कितनी तबाही मचाई है। नेपाल आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा शेयर की गई इन तस्वीरों में बाढ़ आने से पहले और बाद का नजारा साफ दिखता है—जिसमें देवीघाट (इमेज 1), बेटावती (इमेज 2), हाकुबेशी (इमेज 3) और स्याफ्रुबेशी (इमेज 4) जैसे इलाकों में इस कुदरती आफत की वजह से हुए भारी बदलाव और वहां के टूटे-फुटे रास्तों व घरों को साफ-साफ देखा जा सकता है।
क्या आपको लगता है कि ग्लोबल वार्मिंग और हिमालयी क्षेत्रों में हो रहे अनियोजित निर्माण कार्यों के कारण ऐसी आपदाएं आने वाले समय में और बढ़ सकती हैं?