कामाख्या मंदिर में पांच दिवसीय अंबुबाची मेला आज श्रद्धा और उल्लास के साथ 'निवृत्ति' अनुष्ठान के बाद संपन्न हो गया।
गुवाहाटी, (असम)। नीलांचल पहाड़ियों पर स्थित मां कामाख्या मंदिर में वार्षिक अंबुबाची मेला आज श्रद्धा और उल्लास के साथ संपन्न हो गया। 22 जून की रात से शुरू हुआ यह धार्मिक महापर्व आज पांचवें दिन सुबह 'निवृत्ति' अनुष्ठान के साथ समाप्त हुआ, जिसके बाद माता के गर्भगृह के कपाट सभी के दर्शन के लिए खोल दिए गए।
'निवृत्ति' अनुष्ठान और मंदिर का शुद्धिकरण
परंपरा के अनुसार, माता कामाख्या के रजस्वला होने पर 22 जून की रात 9:08 बजे मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए थे। इसके बाद लगातार तीन दिनों तक पूजा-अर्चना मंदिर के बाहर से ही की गई थी। आज यानी सुबह सूर्योदय के समय, मंदिर के मुख्य पुजारी की देखरेख में माता का महास्नान, विशेष शुद्धिकरण अनुष्ठान और 'नित्य पूजा' संपन्न की गई। इन गुप्त और विशेष अनुष्ठानों के पूरा होने के बाद जैसे ही सुबह मंदिर के कपाट खुले, पूरी नीलांचल पहाड़ी "जय मां कामाख्या" के जयकारों से गूंज उठी।
'रक्त वस्त्र' प्रसाद पाने उमड़ी लाखों भक्तों की भीड़
अंबुबाची मेले के समापन पर सबसे विशेष आकर्षण मां का 'रक्त वस्त्र' पाना होता है। मान्यता है, कि तीन दिनों के एकांतवास के दौरान देवी की मूर्ति के पास जो सफेद कपड़ा रखा जाता है, वह इस अवधि में लाल हो जाता है। इस अत्यंत पवित्र और चमत्कारी माने जाने वाले वस्त्र को प्रसाद के रूप में प्राप्त करने के लिए देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालुओं और तांत्रिकों की लंबी कतारें देखी जा रही हैं।
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