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डाइटिंग के बाद क्यों लौटता है वजन?

डाइटिंग के बाद क्यों बढ़ जाता है वजन? शोध में सामने आई मस्तिष्क की बड़ी भूमिका

वजन कम करना केवल इच्छाशक्ति का मामला नहीं है। एक नए शोध में सामने आया है कि मानव मस्तिष्क शरीर की चर्बी को बचाने के लिए जैविक रूप से प्रोग्राम किया गया है।

डाइटिंग के बाद क्यों बढ़ जाता है वजन शोध में सामने आई मस्तिष्क की बड़ी भूमिका

Brain Linked to Weight Regain |

वॉशिंगटन [अमेरिका]: वजन कम करना केवल इच्छाशक्ति का मामला नहीं है। एक नए शोध में सामने आया है कि मानव मस्तिष्क शरीर की चर्बी को बचाने के लिए जैविक रूप से प्रोग्राम किया गया है। यही वजह है कि कई लोगों के लिए सफल डाइटिंग के बाद भी लंबे समय तक वजन नियंत्रित रखना मुश्किल हो जाता है।

मस्तिष्क ऊर्जा भंडार को बचाने की करता है कोशिश

द कन्वर्सेशन में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, मानव मस्तिष्क भोजन की कमी के समय ऊर्जा भंडार को सुरक्षित रखने के लिए विकसित हुआ है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तंत्र कभी आदिम मनुष्यों के जीवित रहने में मददगार था, लेकिन आज के समय में, जब कैलोरी से भरपूर भोजन आसानी से उपलब्ध है और शारीरिक गतिविधि कम हो गई है, यह वजन कम करने वालों के लिए चुनौती बन गया है।

वजन घटते ही शरीर देता है 'खतरे' का संकेत

शोधकर्ताओं के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति वजन कम करता है तो शरीर इसे अस्तित्व के लिए खतरे की तरह मानता है। इससे भूख बढ़ जाती है, खाने की इच्छा अधिक होने लगती है और शरीर ऊर्जा खर्च कम करके वसा को बचाने की कोशिश करता है। शोध में यह भी सामने आया कि मस्तिष्क व्यक्ति के पहले के अधिक वजन को "याद" रख सकता है। एक बार शरीर अधिक वजन तक पहुंच जाए तो मस्तिष्क उसे सामान्य स्थिति मान लेता है और वजन कम होने के बाद दोबारा उसी स्तर तक पहुंचाने का प्रयास करता है शोधकर्ताओं ने कहा कि डाइटिंग के बाद वजन बढ़ना अनुशासन की कमी नहीं, बल्कि शरीर की स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया का परिणाम हो सकता है।

नई दवाएं मददगार, लेकिन हर किसी के लिए नहीं

लेख में वेगोवी और मौनजारो जैसी नई मोटापा-रोधी दवाओं का भी उल्लेख किया गया है। ये दवाएं आंत के हार्मोन की नकल कर मस्तिष्क को भूख कम करने का संकेत देती हैं। हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि ये दवाएं हर व्यक्ति पर समान रूप से प्रभावी नहीं होतीं। कुछ लोगों को इनके दुष्प्रभाव होते हैं और कई मामलों में दवा बंद करने के बाद वजन दोबारा बढ़ सकता है।

स्वास्थ्य सिर्फ वजन से नहीं मापा जा सकता

शोधकर्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि बेहतर स्वास्थ्य का पैमाना केवल शरीर का वजन नहीं होना चाहिए। नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, संतुलित आहार और अच्छी मानसिक सेहत से हृदय और चयापचय संबंधी स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है, भले ही वजन में बहुत अधिक बदलाव न आए।

मोटापे से निपटने के लिए जरूरी है व्यापक रणनीति

लेख में कहा गया है कि मोटापे को केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी मानने के बजाय इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके लिए स्वस्थ स्कूली भोजन, बच्चों को लक्षित जंक फूड विज्ञापनों पर नियंत्रण, पैदल और साइकिल चलाने को बढ़ावा देने वाले शहर तथा रेस्तरां में भोजन की मात्रा को मानकीकृत करने जैसे उपाय जरूरी हैं।

बचपन से ही पड़ता है असर

शोधकर्ताओं का मानना है कि गर्भावस्था से लेकर लगभग सात वर्ष की आयु तक का समय शरीर की वजन नियंत्रण प्रणाली के विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान माता-पिता का आहार, शिशु के खान-पान की आदतें और शुरुआती जीवनशैली भविष्य में वजन और भूख को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाती हैं।

मोटापा एक जैविक स्थिति है

शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि मोटापा केवल जीवनशैली का परिणाम नहीं, बल्कि मस्तिष्क, जीन और आसपास के वातावरण से प्रभावित एक जैविक स्थिति है। उनका मानना है कि तंत्रिका विज्ञान, दवा विज्ञान और जनस्वास्थ्य रणनीतियों में हो रही प्रगति भविष्य में मोटापे के बेहतर उपचार और रोकथाम के नए रास्ते खोल सकती है।

ANI

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