दोवड़ा चौराहे पर आदिवासी समाज के लोगों ने आदिवासी समाज को 'वनवासी' कहे जाने के विरोध में देश के गृह मंत्री एवं मुख्यमंत्री का प्रतीकात्मक पुतला दहन किया।
डूंगरपुर (राजस्थान)। भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) के नेतृत्व में आज गुरुवार को दोवड़ा चौराहे पर आदिवासी समाज, युवाओं, महिलाओं एवं कार्यकर्ताओं ने एकत्रित होकर आदिवासी समाज को 'वनवासी' कहे जाने के विरोध में देश के गृह मंत्री एवं मुख्यमंत्री का प्रतीकात्मक पुतला दहन किया। प्रदर्शनकारियों ने इसे आदिवासी समाज की अस्मिता, सांस्कृतिक पहचान एवं संवैधानिक सम्मान पर आघात बताते हुए अपना विरोध दर्ज कराया।

विधानसभा क्षेत्र की जनसमस्याओं को लेकर तहसीलदार को सौंपा ज्ञापन
इसके बाद भारत आदिवासी पार्टी के पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने तहसील कार्यालय दोवड़ा पहुंचकर तहसीलदार को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन के माध्यम से राज्य एवं केंद्र सरकार का ध्यान आसपुर विधानसभा क्षेत्र की गंभीर जनसमस्याओं, मूलभूत सुविधाओं की कमी, बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, कृषि संकट, पेयजल एवं विद्युत समस्याओं सहित आदिवासी समाज के सम्मान एवं अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों की ओर आकर्षित किया गया।

महंगाई, कृषि संकट और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में सुधार की मांग
ज्ञापन में बताया गया कि पेट्रोल, डीजल एवं घरेलू गैस सिलेंडर की लगातार बढ़ती कीमतों से आमजन, किसान, मजदूर एवं मध्यम वर्ग का जीवन प्रभावित हो रहा है। साथ ही किसानों को समय पर खाद एवं बीज उपलब्ध कराने, कालाबाजारी पर रोक लगाने, सामाजिक सुरक्षा पेंशन का नियमित भुगतान सुनिश्चित करने तथा महात्मा गांधी नरेगा योजना में पारदर्शिता लाने की मांग भी प्रमुखता से उठाई गई।

मूलभूत सुविधाओं के समाधान की अपील
भारत आदिवासी पार्टी ने अघोषित विद्युत कटौती पर रोक लगाने, जल जीवन मिशन के अंतर्गत प्रत्येक घर तक शुद्ध पेयजल पहुंचाने, पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव समय पर कराने तथा क्षेत्र की सड़क, स्वास्थ्य एवं शिक्षा संबंधी समस्याओं का प्राथमिकता के आधार पर समाधान करने की मांग की। ज्ञापन में कहा गया कि आसपुर विधानसभा क्षेत्र के अनेक गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं, जिससे आमजन को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

आदिवासी पहचान का मुद्दा: 'आदिवासी' शब्द ही संवैधानिक और मान्य
आदिवासी समाज की पहचान के मुद्दे पर पार्टी नेताओं ने कहा कि भारतीय संविधान एवं सरकारी अभिलेखों में “आदिवासी” शब्द मान्य एवं सम्मानजनक है। इसलिए शासकीय एवं सार्वजनिक मंचों पर आदिवासी समाज के लिए केवल संवैधानिक शब्द “आदिवासी” का ही सम्मानपूर्वक उपयोग किया जाना चाहिए।
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