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भोजशाला विवाद: मंदिर के प्रमाण मिटाए गए

भोजशाला में मस्जिद बनाने से पहले छेनी-हथौड़े से मिटाए मंदिर के सबूत

धार। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट के अनुसार, धार की ऐतिहासिक भोजशाला का मौजूदा ढांचा मूल रूप से एक विशाल हिंदू मंदिर था।

 भोजशाला में मस्जिद बनाने से पहले छेनी-हथौड़े से मिटाए मंदिर के सबूत

Historical Temple Evidence |

धार। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट के अनुसार, धार की ऐतिहासिक भोजशाला का मौजूदा ढांचा मूल रूप से एक विशाल हिंदू मंदिर था। इसे बाद में संशोधित कर मस्जिद का रूप दिया गया। सर्वे में पाया गया कि मंदिर की शिलाओं और खंभों की पहचान छिपाने की कोशिश की गई थी। प्राचीन शिलालेखों और देवी-देवताओं की आकृतियों को छेनी-हथौड़े से जानबूझकर नष्ट किया गया ताकि मूल पहचान मिटाई जा सके।

परमार काल की नींव मिली, जिसपर शारदा सदन खुदा है

वर्तमान ढांचे के नीचे 10वीं-11वीं शताब्दी (परमार काल) की नींव मिली है, जो बेसाल्ट पत्थर की बनी है. इस पर 'शारदा सदन' और सुप्रसिद्ध साहित्य कृति 'पारिजात मंजरी' के शिलालेख खुदे मिले हैं। रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि मंदिर के ऊपरी हिस्से को हटाकर वहां मौजूद सामग्रियों का उपयोग कर मस्जिद बनाई गई। निर्माण में इतनी जल्दबाजी दिखाई गई कि न तो डिजाइन का ध्यान रखा गया और न ही समरूपता का। कई पत्थर उल्टे या आड़े-तिरछे लगाए गए हैं।

नागबंध और व्याकरण के शिलालेख 

स्तंभों पर सांपों के आकार वाले (नागबंध) चित्र और व्याकरण से जुड़े शिलालेख मिले हैं, जो यह संकेत देते हैं कि राजा भोज के समय यह एक बड़ा शिक्षा केंद्र था। वैज्ञानिक जांच के अनुसार, इस जगह का निर्माण तीन चरणों में हुआ। जो हिस्सा आज मस्जिद जैसा दिखता है, वह सबसे बाद का है और उसे एक पुराने क्षतिग्रस्त मंदिर के ऊपर बनाया गया है।

​शिलालेखों के साथ किया गया छेड़छाड़

फर्श और दीवारों में लगे पत्थरों पर लिखे अक्षरों को जानबूझकर घिस दिया गया या उन्हें उल्टा लगा दिया गया ताकि उन्हें पढ़ा न जा सके। दीवारों पर युद्ध के दृश्य मिले हैं, जिनमें हाथी और सैनिक दिखाई देते हैं। वहां एक नन्हे बच्चे के हाथ का निशान भी मिला है। खंभों पर 139 से अधिक प्रकार के निशान (जैसे त्रिशूल, स्वास्तिक) मिले हैं, जो उस समय के कारीगरों के सिग्नेचर या कोड थे।

क्या कहते हैं ​विशेषज्ञ

​के.के. मोहम्मद (ASI के पूर्व पुरातत्वविद्) ने कहा कि भोजशाला ही नहीं, मथुरा और ज्ञानवापी भी हिंदुओं को देनी चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि दोनों समुदायों को सोचना चाहिए कि विवाद आगे न बढ़े और आर्कियोलॉजी को हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। वहीं, ​अब्दुल समद (मुस्लिम पक्ष) कहते हैं कि वे 2003 से आपत्ति दर्ज करा रहे हैं कि चीजों को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। वे इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाएंगे।

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