इंदौर हाई कोर्ट ने बच्चों की कस्टडी से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने बेंगलुरु निवासी एक पिता द्वारा दायर 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (Habeas Corpus) याचिका को खारिज कर दिया।
इंदौर (एमपी)। इंदौर हाई कोर्ट ने बच्चों की कस्टडी से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने बेंगलुरु निवासी एक पिता द्वारा दायर 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (Habeas Corpus) याचिका को खारिज कर दिया। पिता ने अपनी याचिका में मांग की थी कि उनके बच्चों को उनकी दादी के पास से लेकर उन्हें सौंप दिया जाए।
दादी की कस्टडी अवैध नहीं
इंदौर हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चों का अपनी दादी के पास रहना किसी भी तरह से 'अवैध अभिरक्षा' (Illegal Custody) की श्रेणी में नहीं आता है। कोर्ट ने माना कि दादी बच्चों की कानूनी संरक्षक की तरह ही हैं और वहां उनकी सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है।
बच्चों की इच्छा को कोर्ट ने दी प्राथमिकता
सुनवाई के दौरान, हाई कोर्ट के न्यायाधीशों ने बच्चों से व्यक्तिगत रूप से बात की। कोर्ट के साथ बातचीत में बच्चों ने अपने पिता के साथ जाने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने भावनात्मक रूप से अपनी इच्छा जाहिर करते हुए कहा, "हमें दादी के पास ही रहने दो।"
कोर्ट ने पिता की याचिका निरस्त की
बच्चों की स्पष्ट असहमति और उनकी वर्तमान स्थिति को देखते हुए, अदालत ने पिता की याचिका को यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि बच्चों को उनकी मर्जी के खिलाफ पिता को नहीं सौंपा जा सकता, विशेषकर तब जब वे अपनी दादी के साथ सुरक्षित और खुश हैं।
जानिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका
यह एक कानूनी प्रक्रिया है जिसका उपयोग तब किया जाता है जब किसी व्यक्ति को लगता है कि किसी को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है। इस मामले में, पिता ने इस तर्क के साथ याचिका लगाई थी कि बच्चों को उनकी मर्जी के बिना दादी के पास रखा गया है, जिसे कोर्ट ने बच्चों से बात करने के बाद गलत पाया। अदालत ने बच्चों के मानसिक और भावनात्मक हित (Welfare of the Child) को सर्वोपरि मानते हुए यह निर्णय लिया है।
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