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पुणे के बच्चों ने रंगे ईको-फ्रेंडली गणपति

पुणे में बच्चों ने स्क्रीन छोड़ थामा पेंटब्रश, पर्यावरण-अनुकूल गणपति मूर्तियों को रंगकर मनाएंगे गणेशोत्सव

गणेशोत्सव नजदीक आने के साथ ही पुणे के बच्चे फोन और डिजिटल स्क्रीन से दूरी बनाकर रंग-बिरंगी बप्पा की प्रतिमाएं बनाने और सजाने में जुट गए हैं।

पुणे में बच्चों ने स्क्रीन छोड़ थामा पेंटब्रश पर्यावरण-अनुकूल गणपति मूर्तियों को रंगकर मनाएंगे गणेशोत्सव

Pune Kids Ditch Screens, Paint Eco-Friendly Ganpati Idols |

पुणे (महाराष्ट्र): गणेशोत्सव नजदीक आने के साथ ही पुणे के बच्चे फोन और डिजिटल स्क्रीन से दूरी बनाकर रंग-बिरंगी बप्पा की प्रतिमाएं बनाने और सजाने में जुट गए हैं। बच्चों को त्योहार से जोड़ने के साथ-साथ पर्यावरण-अनुकूल गणेश प्रतिमाओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए विशेष पहल शुरू की गई है। गणेशोत्सव 14 सितंबर से शुरू होकर 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के साथ समाप्त होगा।

'पेंट, क्रिएट, सेलिब्रेट बप्पा' थीम पर पहल

'पेंट, क्रिएट, सेलिब्रेट बप्पा' थीम पर आधारित इस पहल में 6 से 15 वर्ष की उम्र के बच्चों को अपनी रचनात्मकता के जरिए गणेशोत्सव मनाने का अवसर दिया जा रहा है। इसके साथ ही बच्चों और परिवारों के बीच पर्यावरण-अनुकूल गणेश प्रतिमाओं के इस्तेमाल को लेकर जागरूकता भी बढ़ाई जा रही है। सुरेंद्र पाथारे फाउंडेशन ने खराड़ी, विमान नगर, वाघोली और वडगांव शेरी समेत विभिन्न आवासीय सोसाइटियों में 3डी गणपति पेंटिंग कार्यशालाओं का आयोजन किया है। इससे बच्चों और उनके परिवारों के लिए इस गतिविधि में शामिल होना आसान हो गया है।

चार-पांच साल पहले शुरू हुआ था अभियान

पहल के बारे में आयोजक सुरेंद्र पाथारे ने बताया कि फाउंडेशन ने करीब चार-पांच साल पहले इस अभियान की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य बच्चों को गणेशोत्सव में अधिक सक्रिय रूप से शामिल करना और उन्हें अपनी रचनात्मकता दिखाने के लिए मंच देना था। पाथारे ने एएनआई से कहा, "दरअसल, हमने बच्चों को गणेश उत्सव में शामिल करने के लिए चार-पांच साल पहले यह अभियान शुरू किया था। ताकि उन्हें अपनी रचनात्मकता दिखाने के लिए एक मंच मिल सके।" उन्होंने कहा कि बच्चे अक्सर त्योहार के दौरान अपने घरों को सजाने में हिस्सा लेते हैं, लेकिन हर बच्चे को गणेशोत्सव से जुड़ी रचनात्मक गतिविधियों में शामिल होने का अवसर नहीं मिलता। उन्होंने कहा, "हमने यह सोचा कि हमें एक ऐसा मंच बनाना चाहिए जहां बच्चे आएं, अपने विचारों और रचनात्मकता को निखारें और पुणे में लोकप्रिय रूप से मनाई जाने वाली संस्कृति से जुड़ें।"

3 हजार बच्चों ने कराया पंजीकरण

पाथारे ने बताया कि स्कूल परीक्षाओं के कारण सप्ताहांत में आयोजित होने वाली कार्यशालाओं के लिए करीब 2,500 से 3,000 बच्चों ने पंजीकरण कराया है। उन्होंने पर्यावरण-अनुकूल तरीके से गणेशोत्सव मनाने के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि फाउंडेशन पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार तरीके से गणेशोत्सव मनाने को लेकर माता-पिता और बच्चों के बीच जागरूकता बढ़ाने का काम जारी रखेगा।

बच्चों के लिए लाई गईं पहले से बनी मूर्तियां

इस पहल की आयोजक ऐश्वर्या पाथारे ने बताया कि पिछले पांच वर्षों से फाउंडेशन का ध्यान मूर्ति-निर्माण पर केंद्रित था। हालांकि, इस साल पहले से बनी पर्यावरण-अनुकूल गणेश मूर्तियां उपलब्ध कराने का फैसला किया गया, क्योंकि छोटे बच्चों को खुद मूर्ति बनाने में कई बार परेशानी होती थी। ऐश्वर्या ने कहा, "छोटे बच्चों के लिए मूर्ति बनाना बहुत मुश्किल होता है। कभी-कभी वे गणपति नहीं बना पाते। तब उन्हें बुरा लगता है कि उनके गणपति बप्पा नहीं बने।" उन्होंने आगे कहा, "इसलिए, इस बार मैंने सोचा कि हम पहले से बनी पर्यावरण-अनुकूल गणेश मूर्तियां मंगवाएंगे और उन्हें हर सोसाइटी तक पहुंचाएंगे।"

120 से ज्यादा सोसाइटियों में हो रही कार्यशालाएं

पहले के आयोजनों में बच्चे एक ही स्थान पर एकत्रित होते थे। लेकिन इस वर्ष फाउंडेशन ने अलग-अलग आवासीय सोसाइटियों में समूह बनाकर कार्यशालाएं आयोजित करने का फैसला किया है। तीन सप्ताहांतों में 120 से अधिक सोसाइटियों में ये कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं। आयोजकों के अनुसार, पहल के लिए करीब 3,000 छात्रों ने पंजीकरण कराया है, जिनमें से 1,000 से अधिक बच्चे अब तक इसमें भाग ले चुके हैं।

बच्चों को स्क्रीन से दूर कर रहा अभियान

ऐश्वर्या ने कहा कि यह पहल बच्चों को डिजिटल स्क्रीन से दूर रहने और त्योहार से सीधे जुड़ने में भी मदद कर रही है। उन्होंने कहा, "बच्चे यहाँ आ रहे हैं, अपने दोस्तों के साथ उत्साह से पेंटिंग कर रहे हैं, वे डिजिटल स्क्रीन से दूर हैं और वास्तव में इस त्योहार का आनंद ले रहे हैं, अपने तरीके से अपने बप्पा की मूर्ति बना रहे हैं।" फाउंडेशन की ओर से सोसाइटियों में विसर्जन की व्यवस्था भी की जा रही है, जिससे परिवारों को त्योहार के बाद पर्यावरण-अनुकूल मूर्तियों का विसर्जन करने में सुविधा होगी।

बच्चों के लिए रचनात्मकता और उत्सव का अनुभव

युवा प्रतिभागियों के लिए यह पहल सिर्फ बप्पा का उत्सव मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें अपनी रचनात्मकता दिखाने का अवसर भी दे रही है। प्रतिभागी समर ने बताया कि उन्हें अपनी मूर्ति को रंगते समय अलग-अलग रंग चुनने और उन्हें मिलाने में काफी मजा आया। उन्होंने कहा, "मैंने यह रंग खुद चुना और मैं पेंटिंग कर रहा था। मैंने रंग मिलाया और इसे रंगा। मुझे यह पेंटिंग करना बहुत अच्छा लगा।" एक अन्य युवा प्रतिभागी चिवेश शाहानी ने इस अनुभव को कागज पर गणपति का चित्र बनाने और उसमें रंग भरने से बिल्कुल अलग बताया। उन्होंने कहा, "मेरा अनुभव बहुत अच्छा रहा क्योंकि उन्होंने मुझे कहानी दर कहानी, चरण दर चरण सिखाया। और अगर आपको कुछ भी चाहिए होता, तो वे आपको जवाब देते या जो भी आप चाहते, वह देते।" उन्होंने बताया कि वह अपनी रंगी हुई बप्पा की मूर्ति को घर ले जाकर परिवार के मंदिर के पास रखने की योजना बना रहे हैं।

माता-पिता ने भी पहल को सराहा

अभिभावकों के लिए भी यह पहल बच्चों को गणेशोत्सव के सांस्कृतिक महत्व से दोबारा जोड़ने का अवसर बन गई है। विमान नगर की निवासी और अभिभावक कनिष्का शाहानी ने कार्यशाला के आयोजन की सराहना की। उन्होंने कहा कि उन्हें अपने बेटे को स्वतंत्र रूप से अपनी मूर्ति को रंगते हुए देखकर खुशी हुई। उन्होंने कहा, "यह मेरे लिए बहुत ही रोमांचक दिन था। मैं थोड़ी संशय में थी क्योंकि यह एक नई संस्था है, लेकिन यह इतनी अच्छी तरह से आयोजित और इतनी खूबसूरती से की गई है।"

बच्चों को मिली मूर्ति, रंग और मार्गदर्शन

एक अन्य युवा प्रतिभागी सिरिशा ने बताया कि कार्यशाला में बच्चों को गणपति की मूर्तियां, चमकीले रंग और गतिविधि में मार्गदर्शन देने के लिए स्वयंसेवक उपलब्ध कराए गए। उन्होंने कहा, "लोगों की मदद करने और ये गणपति मूर्तियां देने के लिए मैं इस संस्था की बहुत आभारी हूँ।" उन्होंने बताया कि गणेशोत्सव के उत्सव वाले माहौल को देखते हुए उन्होंने अपनी मूर्ति के लिए चमकीले रंग चुने हैं और विसर्जन से पहले घर पर बप्पा की पूजा करने की योजना बना रही हैं। इस पहल में कला, सामुदायिक भागीदारी और पर्यावरण जागरूकता का संगम देखने को मिल रहा है। साथ ही, पुणे के बच्चों को गणेशोत्सव का व्यावहारिक अनुभव मिल रहा है, जो उन्हें डिजिटल स्क्रीन से दूर कर त्योहार की परंपराओं और रचनात्मकता के करीब ला रहा है।

(एएनआई)

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