झाबुआ जिले के राजपुरा अंचल में पानी की कमी, बंजर पहाड़ियां, पलायन के लिए मजबूर लोग से यहां दो चार हो रहे थे। अब यह इलाका जल संरक्षण और हरियाली की नई इबारत लिख रहा है।
Tribal Villages in Jhabua Transform Barren Land with Community Water Conservation |
राजपुरा (झाबुआ)। मध्य प्रदेश के झाबुआ जिला का आदिवासी अंचल अपने प्रयासों के कारण चर्चा में है। यहां के लोगों की इच्छा शक्ति बहुत मजबूत थी जिसका परिमाण भी सामने है। संसाधन सीमित थे लोकिन यहां के लोगों ने प्रयास पुरजोर किया। इसका असर साफ दिखने लगा है। राजपुरा में लोगों ने साबित किया कि इच्छा शक्ति मजबूत हो तो किसी भी बड़े बदलाव को लाना असंभव नहीं है।
बंजर जमीन से निकाला पानी
पानी की कमी, बंजर पहाड़ियां, पलायन के लिए मजबूर लोग से यहां दो चार हो रहे थे। यहां का यह कड़वा सच बन गया था। लेकिन समय बदला, यह इलाका अब जल संरक्षण और हरियाली की नई इबारत लिख रहा है। उम्मीद का उजाला यहां फैल गया है। राजपुरा और आसपास के गांवों में वर्षों से पानी की किल्लत रही है। इसके कारण खेती सीमित था, रोजगार के अवसर भी कम थे और तो और गर्मी के मौसम में गांव पानी की समस्या से जूझने लगता था। हालात इतने विषम हो गये कि लोगों को खुद ही समस्या का समाधान तलाशना पड़ा।
ग्रामीणों के प्यास से विशाल तालाब ने लिया आकार
इसी समस्या और उसके निदान को लेकर प्रेरित ग्रामीणों के प्रयास से बंजर पहाड़ी के बीच एक विशाल तालाब ने आकार ले लिया। यह अभियान शिवगंगा अभियान के मार्गनिर्देशन और ग्राणीणों के सहयोह से शुरू हुआ। मालूम हो कि शिवगंगा झाबुआ का एक सामाजिक अभियान है। इसके तहत अभी तक 130 तलाब बनाए गये हैं। इसके साथ 30 हेक्टेयर क्षेत्र में बंजर भूमि को तालाब बनाने का संकल्प लिया गया।
हलमा पद्धति से श्रमदान
आदिवासी समाज की पारंपरिक हलमा पद्धति से श्रमदान किया गया। हत्यादेली, खालखंडवी, मालखांडवी और करीब के गांवों में लोग श्रमदान करते हैं। कई ग्राणीम शिवगंगा अभियान के इंजीनियरिंग प्रशिक्षण वर्ग में भी प्रशिक्षित हुए हैं। इससे उन्हें तालाब निर्माण को लेकर तकनीकि समझ का भी फायदा मिला।
तालाब के काम बरती जाती है सावधानी
यहां तालाब की पाल करीब 150 फीट लंबी और 35 फीट ऊंची बनाई जा रही है। पाल की मजबूती, पिंचिंग और मिट्टी भराव का काम में तकनीकी सावधानी बरती जा रही है। ग्रामीण संजय भूरिया दावा करते हैं कि तालाब में करीब 10 करोड़ लीटर पानी संरक्षित हो सकता है। अगले मॉनसून में पानी यहां रूकेगा जिसका फायदा बंजर जमीन को मिलेगा। इससे पूरे क्षेत्र हरियाली के साथ ही खेती के भी नए-नए अवसर लोंगों को मिलेंगे।
यहां के परिवारों को मिलेगा लाभ
सरपंच प्रेम भाभर कहते हैं, इस योजना से 200 परिवारों को लाभ मिलेगा। इस काम से भूजल का स्तर सुधरेगा और भविष्य में पानी की कमी नहीं होगी। गांव में लोगों को रोजगार और खेती के अवसर बढ़ेंगे। इससे पलायन पर भी रोक लगेगा। स्थानीय बसंत भाबोर कहते है, करीब 30 दिन तक लोगों ने लगातार चार गांव के 30 से अधिक ग्रामीण प्रतिदिन श्रमदान करते रहे। श्रमिकों के भोजन आदि की व्यवस्था भी सामूहिक रूप से की गई। हाल के बेमौसम बारिश से तालाब में पानी भरा जिससे काम कुछ बाधित हुआ। लोगों की इस पहल का सबसे प्रभावी कारण पूरे काम में होने वाली लागत है। इसी काम को सरकारी एजेंसी के माध्यम से कराया जाता तो 50 लाख रुपये का लागत आता। लकिन वही काम जनसहयोग और श्रमदान से 12 लाख रुपये में संपन्न हो रहा है। इसमें आधा श्रमदान और बाकी मशीन और डीजल से काम पूरा किया गया। शिकगंगा अभियान से जुड़े भंवर सिंह बताते हैं कि तालाब का 90 फीसदी काम पूरू हो चुका है।
जानिए हलमा पद्धति के बारे में
आदिवासी समाज की पारंपरिक श्रमदान की पद्धति को हलमा कहते हैं। इसमें गांव के लोग बिना मजदूरी लिए मिलकर श्रमदान करते हैं और तालाब, मेड़बंदी, जलस्त्रोंत और पर्यावरण के अनुकूल काम किया जाता है। इसमें श्रमदान के साथ-साथ सामूहिक एकता प्रकृति के प्रति सबकी जिम्मेदीरी का प्रतीक माना जाता है।
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