बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के हालिया चीन दौरे ने एक नए अंतरराष्ट्रीय विवाद को जन्म दे दिया है। बीजिंग और ढाका के बीच जारी हुए एक संयुक्त बयान पर जापान ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है।
ढाका (बांग्लादेश)। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के हालिया चीन दौरे ने एक नए अंतरराष्ट्रीय विवाद को जन्म दे दिया है। बीजिंग और ढाका के बीच जारी हुए एक संयुक्त बयान पर जापान ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। दरअसल, इस साझा बयान में 'फासीवादी और सैन्यवादी पुनरुत्थान' के विरोध की बात कही गई है, जिसे जापान सीधे तौर पर अपने खिलाफ बीजिंग की आक्रामक बयानबाजी मान रहा है। जापानी राजनयिक सूत्रों का कहना है कि टोक्यो इस मामले को बेहद गंभीरता से ले रहा है और जल्द ही इस पर बांग्लादेश सरकार से आधिकारिक स्पष्टीकरण मांग सकता है।
डालियान में आयोजित 'समर दावोस' में लिया हिस्सा
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि प्रधानमंत्री तारिक रहमान की 22 से 26 जून, 2026 तक चली चीन की आधिकारिक यात्रा से जुड़ी है। चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग के निमंत्रण पर बीजिंग पहुंचे रहमान ने वहां डालियान में आयोजित 'समर दावोस' (17th Annual Meeting of the New Champions 2026) में भी हिस्सा लिया था। इस दौरे के दौरान उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, प्रधानमंत्री ली कियांग और नेशनल पीपल्स कांग्रेस के स्थायी समिति के अध्यक्ष झाओ लेजी के साथ द्विपक्षीय संबंधों और क्षेत्रीय मुद्दों पर गहन चर्चा की। इसी मुलाकात के बाद जारी साझा घोषणापत्र ने अब टोक्यो को असहज कर दिया है।
साझा बयान की विवादित भाषा बनी वजह
चीन और बांग्लादेश के साझा बयान के जिस हिस्से पर विवाद बढ़ा है, उसमें स्पष्ट लिखा है, "दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध की जीत के परिणामों को दृढ़ता से बनाए रखना और किसी भी फासीवादी व सैन्यवादी पुनरुत्थान के प्रयासों का विरोध करना आवश्यक है।" इसके साथ ही दोनों देशों ने काहिरा घोषणापत्र और पॉट्सडैम उद्घोषणा सहित स्थापित युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया है।
'फासीवादी' शब्दावली पर जापान की नाराजगी
एक जापानी राजनयिक सूत्र के मुताबिक, "बीजिंग वर्तमान टोक्यो सरकार को पसंद नहीं करता है और उसकी आलोचना करने के लिए अक्सर 'फासीवादी और सैन्यवादी पुनरुत्थान' जैसी शब्दावली का इस्तेमाल करता है।" यही वजह है कि बांग्लादेश और चीन के साझा बयान में इस हूबहू शब्दावली के शामिल होने से जापान की चिंताएं बढ़ गई हैं।
बांग्लादेश की संतुलित कूटनीति पर बढ़ा दबाव
राजनयिक विश्लेषकों का मानना है कि जापान और चीन दोनों ही बांग्लादेश के बेहद करीबी विकास और आर्थिक साझेदार हैं। ऐसे में चीन की इस भारी-भरकम और आक्रामक कूटनीतिक भाषा पर हस्ताक्षर करना बांग्लादेश को भारी पड़ सकता है। इससे न सिर्फ टोक्यो के साथ द्विपक्षीय वार्ता के दौरान असहज करने वाले सवाल उठेंगे, बल्कि बांग्लादेश की पुरानी न्यूट्रल कूटनीति भी प्रभावित हो सकती है।
प्रभाव विश्लेषण: आम जनता और कूटनीति पर क्या होगा असर?
गौरतलब है कि बांग्लादेश हमेशा से 'सभी से मित्रता, किसी से बैर नहीं' की तटस्थ विदेश नीति पर चलता रहा है। लेकिन चीन के मंच से इस तरह के बयान का समर्थन करने से उसकी इस निष्पक्ष छवि को नुकसान पहुंच सकता है। जापान के साथ भविष्य में होने वाली उच्च स्तरीय बैठकों में अब ढाका को इस पर कड़ा जवाब देना होगा।
क्या इसका असर बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था और विकास परियोजनाओं पर पड़ेगा?
जापान बांग्लादेश में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए बड़े पैमाने पर वित्तीय मदद और निवेश करता है। यदि यह राजनयिक कड़वाहट समय रहते नहीं सुलझाई गई, तो दोनों देशों के बीच भविष्य में होने वाली आर्थिक सहयोग की वार्ताओं पर इसका सीधा असर पड़ सकता है, जो अंततः बांग्लादेश की आम जनता और विकास परियोजनाओं को प्रभावित करेगा। (Source: ANI)
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