फ्रीडम नेटवर्क की हालिया वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान का मीडिया जगत अपने इतिहास की सबसे गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है।
इस्लामाबाद (पाकिस्तान)। फ्रीडम नेटवर्क की हालिया वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 3 मई को मनाए जाने वाले विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस से पहले पाकिस्तान का मीडिया जगत अपने इतिहास की सबसे गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। यह बात फ्रीडम नेटवर्क की ताज़ा वार्षिक रिपोर्ट में कही गई है।
अभिव्यक्ति पर बढ़ता कानूनी और संस्थागत दबाव
'रेगुलेटरी रिप्रेशन ऑफ फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन' शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में देश में प्रेस की आज़ादी की स्थिति का कठोर आकलन किया गया है। इसमें चेतावनी दी गई है कि स्वतंत्र पत्रकारिता को कानूनी दबाव, सेंसरशिप, आर्थिक अस्थिरता और बढ़ते शारीरिक खतरों के जरिए व्यवस्थित तरीके से कमजोर किया जा रहा है।
PECA कानून बना पत्रकारों पर शिकंजा
यह रिपोर्ट 2025 के मध्य से 2026 की शुरुआत तक के घटनाक्रम को कवर करती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान में अभिव्यक्ति की आज़ादी का संकट अब कुछ अलग-थलग घटनाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक व्यापक व्यवस्था का हिस्सा बन गया है। इसका उद्देश्य असहमति को नियंत्रित और दबाना है। इस कार्रवाई के केंद्र में प्रिवेंशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम्स एक्ट (PECA) है, जिसे 2016 में साइबर अपराध से निपटने के लिए लाया गया था। अब इसका इस्तेमाल पत्रकारों, एक्टिविस्टों, वकीलों और राजनीतिक टिप्पणीकारों को निशाना बनाने के लिए बढ़ता जा रहा है।
ढीले प्रावधानों से 'फेक न्यूज़' के नाम पर कार्रवाई
रिपोर्ट के मुताबिक, 'फेक न्यूज़' और 'आपत्तिजनक कंटेंट' जैसे ढीले-ढाले प्रावधानों के तहत PECA का व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे मीडिया जगत में डर का माहौल बन गया है। मानवाधिकार वकील इमान माजरी और हादी अली चट्ठा को सोशल मीडिया टिप्पणियों के मामले में सजा मिलने जैसे उदाहरणों को यह दिखाने के लिए पेश किया गया है कि इस कानून का उपयोग अभिव्यक्ति को अपराध बनाने के लिए बढ़ रहा है।
पत्रकारों पर बढ़ते केस और डर का माहौल
अक्टूबर 2025 तक कम से कम 30 पत्रकारों पर PECA के तहत 36 कानूनी मामले दर्ज हुए थे, जबकि रिपोर्ट में दिए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार संशोधित कानून के तहत फेक न्यूज़ से जुड़े 187 मामले दर्ज किए गए। आलोचकों का कहना है कि इन मामलों में अधिकतर निशाना असहमति रखने वाली आवाज़ें ही बन रही हैं, जिससे बड़े स्तर पर स्व-सेंसरशिप बढ़ रही है।
सरकारी संस्थाओं की बड़ी भूमिका पर सवाल
रिपोर्ट में समीक्षा अवधि के दौरान पत्रकारों के खिलाफ 129 सत्यापित उल्लंघनों का उल्लेख किया गया है। इनमें से लगभग आधे मामले कानूनी दबाव जैसे गिरफ्तारी, मुकदमे और हिरासत से जुड़े थे, जबकि बड़ी संख्या में शारीरिक हमले, धमकियां और हिंसा के मामले भी सामने आए। 60 प्रतिशत से अधिक मामलों में सरकारी संस्थाओं को मुख्य जिम्मेदार बताया गया है, खासकर कानूनी और हिरासत से जुड़े मामलों में। वहीं गैर-सरकारी तत्व जैसे उग्रवादी समूह, आपराधिक नेटवर्क और राजनीतिक गुट भी पत्रकारों के लिए खतरा बने रहे।
पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा बने सबसे खतरनाक क्षेत्र
भौगोलिक रूप से पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक क्षेत्र रहे हैं। यहां कुल मामलों का लगभग दो-तिहाई हिस्सा दर्ज किया गया। हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत गिलगित-बाल्टिस्तान में कम आंकड़े सामने आना वहां सुरक्षा जोखिम और सीमित दस्तावेज़ीकरण के कारण कम रिपोर्टिंग का नतीजा हो सकता है।
डिजिटल सेंसरशिप और इंटरनेट बंदी का बढ़ता इस्तेमाल
रिपोर्ट में डिजिटल और तकनीकी नियंत्रण के बढ़ते इस्तेमाल पर भी चिंता जताई गई है। बताया गया है कि कई टीवी चैनलों को अचानक बंद किया गया, ऑनलाइन कंटेंट ब्लॉक किया गया और कई यूट्यूब चैनलों पर "एंटी-स्टेट" नैरेटिव फैलाने के आरोप में प्रतिबंध लगाने की कोशिश की गई। इसके अलावा, इंटरनेट बंद करना और कनेक्टिविटी में रुकावटें भी खासकर राजनीतिक रूप से संवेदनशील समय में सूचना तक पहुंच को सीमित करने के लिए इस्तेमाल की गईं। अगस्त 2025 में बलूचिस्तान में 16 दिन तक इंटरनेट बंद रहने का उदाहरण भी दिया गया है।
आर्थिक दबाव ने मीडिया की रीढ़ कमजोर की
आर्थिक असुरक्षा को भी मीडिया की स्वतंत्रता कमजोर करने वाला बड़ा कारण बताया गया है। देरी से वेतन मिलना, बड़े पैमाने पर छंटनी, स्थानीय दफ्तरों का बंद होना और सरकारी विज्ञापनों पर निर्भरता ने कई पत्रकारों को आर्थिक रूप से कमजोर बना दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी विज्ञापनों का चयनात्मक वितरण संपादकीय नीतियों को प्रभावित करने का एक अप्रत्यक्ष लेकिन प्रभावी तरीका बन गया है।
महिला पत्रकारों के लिए और कठिन हालात
महिला पत्रकारों के सामने स्थिति और भी कठिन बताई गई है। रिपोर्ट में कार्यस्थल पर भेदभाव, ऑनलाइन उत्पीड़न, डीपफेक हमले और कानूनी दबाव जैसे मामलों का जिक्र किया गया है। साथ ही यह भी बताया गया है कि पाकिस्तानी न्यूज कंटेंट में महिलाओं की भागीदारी घटकर सिर्फ 4 प्रतिशत रह गई है, जो व्यवस्था में मौजूद असमानता को दर्शाता है।
सूचना के अधिकार कानून का कमजोर क्रियान्वयन
हालांकि पाकिस्तान में सूचना का अधिकार कानून मौजूद है, लेकिन फ्रीडम नेटवर्क का कहना है कि इसका सही तरीके से लागू न होना, नौकरशाही की रुकावटें और गोपनीयता से जुड़े कानून पारदर्शिता और जवाबदेही को कमजोर करते हैं।
सुधार नहीं हुए तो लोकतंत्र पर गहरा खतरा
रिपोर्ट के अंत में कहा गया है कि अगर जल्द सुधार नहीं किए गए, जैसे PECA में बदलाव, पत्रकारों की सुरक्षा को मजबूत करना, सूचना के अधिकार को प्रभावी बनाना और डिजिटल नियमों में संतुलन लाना, तो पाकिस्तान में सेंसरशिप और दमन का यह चक्र और गहरा हो सकता है, जो देश के लोकतांत्रिक भविष्य को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।
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