नई दिल्ली। रसोई गैस की किल्लत के बीच नये वित्त वर्ष की शुरुआत के साथ ही आम आदमियों की जेब पर महंगाई का बोझ बढ़ने वाला है।
नई दिल्ली। रसोई गैस की किल्लत के बीच नये वित्त वर्ष की शुरुआत के साथ ही आम आदमियों की जेब पर महंगाई का बोझ बढ़ने वाला है। केन्द्र सरकार की मंजूरी के बाद 1 अप्रैल 2026 से पेरासिटामोल, एंटीबायोटिक्स समेत एक हजार से अधिक जरूरी दवाओं के दाम बढ़ जाएंगे।
1 अप्रैल से बढ़ेंगे दाम
सरकार ने आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (NLEM) में शामिल दवाओं की कीमतों में करीब 0.6% तक बढ़ोतरी की अनुमति दे दी है। यह बढ़ोतरी 1000 से ज्यादा आवश्यक दवाओं पर लागू होगी। यह बदलाव थोक मूल्य सूचकांक (WPI) में बदलाव के आधार पर हर साल 1 अप्रैल को लागू होने वाली नियमित मूल्य वृद्धि का हिस्सा हो सकता है।
NPPA का फैसला
राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने आवश्यक दवाओं की कीमतों (Medicine Prices) में इजाफा करने का फैसला किया है। इस बढ़ोतरी से मरीजों पर अब के मुकाबले लगभग 3,788 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च आएगा।
WPI के आधार पर बढ़ोतरी
राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने बताया, "वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के उद्योग एवं आंतरिक व्यापार विभाग में आर्थिक सलाहकार कार्यालय द्वारा उपलब्ध कराए गए थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के आंकड़ों के आधार पर, वर्ष 2025 के दौरान वर्ष 2024 की समान अवधि की तुलना में WPI में वार्षिक बदलाव (+) 0.64956% है।" समायोजित कीमतें NLEM की 1,000 से अधिक दवाओं पर लागू होंगी।
साल में एक बार मिलती है अनुमति
सूचीबद्ध (नियंत्रित) दवाओं के दामों में बदलाव की अनुमति साल में एक बार दी जाती है। NPPA के अनुसार, दवाओं की कीमतों में यह बढ़ोतरी मुद्रास्फीति आधारित मूल्य संशोधन के कारण दवा निर्माता कंपनियों की मांग को देखते हुए की जा रही है। आवश्यक दवाओं की सूची में पेरासिटामोल, बैक्टीरियल संक्रमण के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक एजिथ्रोमाइसिन, खून की कमी (एनीमिया) की दवाएं, विटामिन और खनिज (मिनरल) जैसी दवाएं शामिल हैं। कोविड-19 के मध्यम से गंभीर रोगियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाएं और स्टेरॉयड भी इस सूची में हैं।
गंभीर बीमारियों की दवाएं भी महंगी
यह बढ़ोतरी उन दवाओं पर लागू होगी जो राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (NLEM) में शामिल हैं। इनमें एंटीबायोटिक्स, पेन किलर, हृदय रोग, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाएं शामिल हैं। NPPA ने इससे पहले वर्ष 2023 में भी दवाओं की कीमतों में 12% तक वृद्धि की थी।
कच्चे माल की लागत बढ़ी
प्राधिकरण ने यह दवाओं की कीमत में वृद्धि का फैसला उत्पादन लागत में वृद्धि से जूझ रही दवा कंपनियों को राहत देने के लिए उठाया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोग और एंटीबायोटिक्स जैसी आवश्यक दवाओं की कीमतों (Medicine Prices) में 1.7% तक की वृद्धि हो सकती है। यह बढ़ोतरी नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) द्वारा तय की जाएगी। मरीजों पर इससे अतिरिक्त वित्तीय बोझ बढ़ सकता है।
API और पैकेजिंग महंगी
"द इकनॉमिक टाइम्स" ने उद्योग विशेषज्ञों के हवाले से बताया है कि चल रहे युद्ध के कारण कुछ प्रमुख एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रिएंट्स (APIs) और सॉल्वेंट्स के दाम काफी बढ़ गए हैं और यह बढ़ोतरी मुश्किल से ही कोई राहत देगी। पिछले कुछ हफ्तों में APIs की कीमतों में औसतन 30-35% की वृद्धि हुई है। उद्योग अधिकारियों ने बताया कि ग्लिसरीन की कीमत 64% बढ़ गई है, जबकि पैरासिटामोल की कीमत 25% और सिप्रोफ्लोक्सासिन कीमत 30% बढ़ गई है। पॉलीविनाइल क्लोराइड जार और एल्युमीनियम फॉयल जैसी पैकेजिंग सामग्री की कीमत में भी 40% की वृद्धि हुई है।
बीमा प्रीमियम भी बढ़ सकता है
फार्मा उद्योग के एक अधिकारी के अनुसार, यह मामूली बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है, जब ईरान युद्ध के कारण बढ़ती इनपुट यानी कच्चे माल की लागत ने उद्योग के मुनाफे के मार्जिन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
मरीजों पर बढ़ेगा बोझ
सरकार के इस फैसले से हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम में भी बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे प्रीमियम दरों में वृद्धि हो सकती है। इसके साथ ही, उन लोगों के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी, जिन्हें नियमित रूप से दवाओं की जरूरत होती है। उनकी मासिक दवा की लागत में वृद्धि होगी, जिससे उनका वित्तीय बोझ बढ़ेगा। विशेषकर बुजुर्गों और क्रॉनिक बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए यह एक बड़ी चुनौती हो सकती है।
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