संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति के संदर्भ पर अपनी राय देते हुए सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ नेडबल बेंच के फैसले को पलटते हुए कहा है कि ......
अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति का संदर्भ
संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति के संदर्भ पर अपनी राय देते हुए सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने डबल बेंच के फैसले को पलटते हुए कहा है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए विधेयक पर सहमति देने या ठुकराने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती।
क्या राज्यपालों पर समय सीमा तय हो सकती है?
राष्ट्रपति ने सर्वोच्च अदालत से राय मांगी थी कि क्या सांविधानिक रूप से समयावधि तय न होने के कारण राज्य विधानसभा से पारित विधेयकों पर राज्यपालों के निर्णय के लिए कोई सीमा निर्धारित की जा सकती है।
संविधान पीठ का निर्णय
प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीआर गवई, न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति एस चांदूरकर की पीठ ने 10 दिनों तक दलीलें सुनने के बाद अपनी राय दी। पीठ ने माना कि यह विषय संवैधानिक पदाधिकारियों के विवेक और संघीय ढांचे की मर्यादा से जुड़ा है।
समय सीमा तय करने से कोर्ट का इंकार
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि राष्ट्रपति और राज्यपाल को भेजे गए विधेयकों पर निर्णय की कोई निश्चित समय सीमा न्यायपालिका तय नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि इन पदों की भूमिका संवैधानिक कर्तव्य है और न्यायिक हस्तक्षेप द्वारा इसे समयबद्ध करना उचित नहीं।
अत्यधिक देरी लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाती है
कोर्ट ने यह भी माना कि बहुत अधिक देरी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा को प्रभावित करती है, इसलिए उम्मीद की जाती है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल उचित समय में अपना निर्णय दें।
14 संवैधानिक प्रश्नों पर कोर्ट की राय
राष्ट्रपति ने अपने संदर्भ पत्र में अनुच्छेद 200 और 201 से जुड़े कुल 14 सवाल भेजे थे, जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय रखी।
बिना वजह देरी पर सीमित न्यायिक हस्तक्षेप संभव
अदालत ने कहा कि यदि राज्यपाल किसी विधेयक पर लंबे समय तक बिना कारण बताए निर्णय नहीं लेते, तो अदालत सीमित स्तर पर दखल दे सकती है, और उन्हें एक निश्चित समय में फैसला लेने का निर्देश दे सकती है— लेकिन विधेयक के गुण-दोष पर कोर्ट विचार नहीं करेगा।
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