साकेत कोर्ट ने CJP की लीगल अफेयर्स हेड रत्ना सिंह की FIR दर्ज करने की अर्जी खारिज कर दी। कोर्ट ने हलफनामा और संबंधित सरकारी अधिकारी का नाम नहीं होने का हवाला दिया।
नई दिल्ली (भारत)। दिल्ली की साकेत कोर्ट ने 'कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल पैरिटी' (CJP) की लीगल अफेयर्स हेड रत्ना सिंह की उस अर्ज़ी को खारिज कर दिया है, जिसमें कथित तौर पर उन्हें गलत तरीके से रोके जाने के मामले में पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने कहा कि अर्ज़ी के साथ आवश्यक हलफनामा नहीं लगाया गया और इसमें किसी विशिष्ट सरकारी अधिकारी का नाम भी नहीं बताया गया, जिससे संबंधित वरिष्ठ अधिकारी की पहचान की जा सके। मामला 10 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से रोके जाने के आरोपों से जुड़ा है। हालांकि, कोर्ट ने अर्ज़ी को प्रक्रियागत और कानूनी खामियों के आधार पर खारिज किया है।
BNSS की धारा 175(4) के पालन में कमी का हवाला
चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट अभिनव पांडे ने कहा कि अर्जी में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 175(4) के प्रावधानों का पालन नहीं किया गया। कोर्ट के अनुसार, किसी विशिष्ट सरकारी अधिकारी का नाम नहीं होने के कारण संबंधित पुलिस अधिकारी के वरिष्ठ अधिकारी की पहचान करना संभव नहीं था, जिससे रिपोर्ट मांगी जा सके।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अर्जी के साथ आवश्यक हलफनामा नहीं लगाया गया था। आदेश में स्पष्ट किया गया कि संबंधित प्रावधान के तहत शपथ पर शिकायत करना जरूरी है। इसी आधार पर कोर्ट ने अर्जी को सुनवाई योग्य नहीं माना और खारिज कर दिया।
NCR दर्ज करने की वैकल्पिक मांग भी खारिज
कोर्ट ने NCR दर्ज करने की वैकल्पिक मांग को भी स्वीकार नहीं किया। आदेश के अनुसार, अर्जी में लगाए गए आरोप गलत तरीके से रोकने और गलत तरीके से कैद करने से संबंधित थे। ये अपराध भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 126 और 127 के तहत आते हैं और संज्ञेय अपराध हैं।
CJM पांडे ने कहा कि अर्जी में लगाए गए आरोपों को देखते हुए BNSS, 2023 की धारा 174(2) के तहत की गई वैकल्पिक मांग भी नहीं बनती। कोर्ट ने इसी आधार पर FIR और NCR से संबंधित मांगों को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने तत्काल रिहाई और स्टेटस रिपोर्ट की मांग पर भी सुनवाई योग्य नहीं माना
रत्ना सिंह की ओर से कथित घटना के संबंध में FIR दर्ज करने और पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट मंगाने का निर्देश देने की मांग की गई थी। इसके अलावा, उनकी तत्काल रिहाई के लिए एक अलग अर्जी भी दाखिल की गई थी।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बिना हलफनामे के Cr.PC की धारा 98 और BNSS, 2023 की धारा 101 के तहत दाखिल अर्जी भी सुनवाई योग्य नहीं है। CJM ने कहा कि मौजूदा अर्जी अपने वर्तमान स्वरूप में पहली नजर में भी सुनवाई योग्य नहीं है और इसलिए इसे खारिज किया जाता है।
रत्ना सिंह ने पुलिस पर गलत तरीके से रोकने का लगाया था आरोप
अर्जी के अनुसार, पेशे से वकील रत्ना सिंह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ वकीलों के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए सुप्रीम कोर्ट जा रही थीं। उनके साथ दो अन्य वकील भी थे। याचिका में आरोप लगाया गया कि अपने घर के बाहर के इलाके में लौटने के बाद वह वकील तारा नरूला के साथ एक कार में बैठी थीं, तभी उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया गया।
याचिका में दावा किया गया कि दो कारों ने उनकी गाड़ी को आगे और पीछे से रोक लिया, जबकि पुलिसकर्मी बाहर खड़े रहे। सिंह ने आरोप लगाया कि उन्हें गलत तरीके से रोका गया और पुलिसकर्मियों ने पूछे जाने के बावजूद उन्हें रोकने का कानूनी आधार नहीं बताया।
पुलिस को कॉल करने और सुरक्षा को लेकर जताई गई थी चिंता
अर्जी में कहा गया कि कथित घटना के दौरान पुलिस को कॉल किया गया था और कॉल से संबंधित विवरण भी दिए गए थे। इसमें रत्ना सिंह की स्वतंत्रता और सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए कहा गया कि परिस्थितियों में कोर्ट के तत्काल हस्तक्षेप की जरूरत थी।
सिंह ने न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा था कि कथित घटना की सक्षम अधिकारियों से जांच कराई जानी चाहिए। उन्होंने संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने और अधिकारियों से स्टेटस रिपोर्ट मंगाने का निर्देश देने की मांग की थी।
CEC के खिलाफ प्रदर्शन के बीच दाखिल हुई थी अर्जी
यह मामला मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कानूनी बिरादरी के सदस्यों के विरोध प्रदर्शन के बीच सामने आया। इस घटनाक्रम में वकीलों के एकत्र होने और अपने विचार व्यक्त करने के अधिकार के साथ-साथ विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए।
हालांकि, साकेत कोर्ट ने रत्ना सिंह की अर्जी को उसके मौजूदा स्वरूप में सुनवाई योग्य नहीं मानते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट के आदेश में हलफनामे की अनुपस्थिति और किसी विशिष्ट सरकारी अधिकारी का नाम नहीं दिए जाने को प्रमुख आधार बताया गया। (Source: ANI)
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