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मतदाता सूची पुनरीक्षण पर गरमाई सियासत

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर गरमाई सियासत, मतदाता सूची पुनरीक्षण पर कानूनी दिग्गजों के अलग-अलग सुर

सुप्रीम कोर्ट के जजों की टिप्पणियों और चुनाव आयोग के मतदाता सूची पुनरीक्षण पर सिंघवी और अश्वनी कुमार ने चिंता जताई, जबकि पूर्व जज लोकपाल सिंह ने इसका बचाव किया है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर गरमाई सियासत मतदाता सूची पुनरीक्षण पर कानूनी दिग्गजों के अलग-अलग सुर

Former Uttarakhand High Court judge Lokpal Singh, Supreme Court advocate and Congress MP Abhishek Manu Singhvi, Former Union Law Minister Ashwani Kumar |

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की नागरिकों के मताधिकार संबंधी हालिया टिप्पणियों और पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर.एफ. नरीमन के बयानों पर कानूनी व राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है। चुनाव आयोग के मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर कांग्रेस नेताओं ने जहां जजों की चिंताओं का समर्थन किया है, वहीं न्यायपालिका के पूर्व जुड़े विशेषज्ञों ने इसे सामान्य प्रक्रिया बताया है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की नागरिकों के मताधिकार संबंधी हालिया टिप्पणियों और पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर.एफ. नरीमन के बयानों पर कानूनी व राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है। चुनाव आयोग (ECI) के मतदाता सूची पुनरीक्षण और नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी व पूर्व कानून मंत्री अश्वनी कुमार ने जहां जजों की चिंताओं का पुरजोर समर्थन किया है, वहीं उत्तराखंड हाईकोर्ट के पूर्व जज लोकपाल सिंह ने इसका बचाव करते हुए इसे एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया करार दिया है।

लोकतंत्र और आम आदमी पर सीधा असर: अभिषेक मनु सिंघवी

सीनियर एडवोकेट और कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने जजों की चिंताओं का समर्थन करते हुए कहा कि उनकी टिप्पणियां उन संवेदनशील मुद्दों से जुड़ी हैं जो लोकतंत्र में सीधे तौर पर आम नागरिक को प्रभावित करते हैं। उन्होंने कहा, "जस्टिस नरीमन एक वकील, लॉ ऑफिसर और जज, तीनों ही भूमिकाओं में बेहद विद्वान व्यक्ति के तौर पर जाने जाते हैं।"

जस्टिस भुइयां का जिक्र करते हुए सिंघवी ने उन्हें "हमारे सबसे सम्मानित और बेबाक लोगों में से एक" बताया, जो बिना किसी डर या झिझक के अपनी बात रखते हैं। उन्होंने कहा कि जस्टिस नरीमन और जस्टिस भुइयां दोनों ने ही "वोट की अहमियत कम होने और वोट खत्म किए जाने" के मुद्दे उठाए हैं। उन्होंने कहा, "लोकतंत्र में आम आदमी पर इससे ज्यादा असर किस चीज का हो सकता है?"

सिंहवी ने उम्मीद जताई कि सिविल सोसाइटी के अन्य वर्ग—जैसे इंजीनियर, डॉक्टर, आर्किटेक्ट, वकील और गृहणियां भी इस विषय पर गहराई से विचार करेंगे और खुलकर अपनी बात रखेंगे। उन्होंने कहा, "मैं उनकी सोच और बात को साफ-साफ कहने की हिम्मत और निडरता का स्वागत करता हूँ।"

मास डिसएनफ्रैंचाइजमेंट पर अश्वनी कुमार की चिंता

पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री अश्वनी कुमार ने भी जस्टिस भुइयां की टिप्पणियों का समर्थन करते हुए कहा कि वे बड़े पैमाने पर लोगों को मताधिकार से वंचित किए जाने (मास डिसएनफ्रैंचाइजमेंट) की आशंकाओं को दर्शाती हैं। उन्होंने कहा कि यदि बड़ी संख्या में लोगों को ऐसी प्रक्रियाओं के तहत चुनावी प्रक्रिया से बाहर किया जाता है, जिनकी कानूनी वैधता पर सवाल उठे हैं, तो यह चिंता का विषय है। उन्होंने राजनीतिक दलों और संस्थाओं से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि चुनावी प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष बनी रहे।

सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है पुनरीक्षण: लोकपाल सिंह

इसके विपरीत, उत्तराखंड हाईकोर्ट के पूर्व जज लोकपाल सिंह ने मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (इंटेंसिव रिवीजन) के मुद्दे पर अलग दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि वोटर लिस्ट का पुनरीक्षण एक सामान्य चुनावी प्रक्रिया है और चुनाव आयोग सालभर नाम जोड़ने व हटाने का काम करता है। उन्होंने कहा कि बड़े पैमाने पर नाम हटाने के आरोपों की जांच में चुनाव आयोग सबसे बेहतर स्थिति में है।

पश्चिम बंगाल और बिहार का जिक्र करते हुए पूर्व जज लोकपाल सिंह ने कहा कि मतदाता पहचान के सत्यापन और अवैध अप्रवासन के दावों के संदर्भ में भी इन आरोपों की जांच की जानी चाहिए। उन्होंने चुनाव आयोग को यह स्थापित करने की सलाह दी कि क्या उचित सत्यापन के बाद नाम हटाए गए थे और तथ्यों को स्थापित किए बिना इस प्रक्रिया पर राजनीतिक मंशा का आरोप लगाने के प्रति आगाह किया। साथ ही, पश्चिम बंगाल चुनावों को लेकर जस्टिस नरीमन की टिप्पणियों से असहमति जताते हुए उन्होंने कहा कि लगभग 90 लाख नाम हटाने के पीछे के कारणों और सीमावर्ती गतिविधियों की भी समग्र समीक्षा होनी चाहिए।
​(भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)

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