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एक राष्ट्र, एक चुनाव पर JPC की अहम बैठक

एक राष्ट्र, एक चुनाव पर JPC की बैठक, दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक प्रभावों और चुनावी खर्च पर हुई चर्चा

JPC ने एक राष्ट्र, एक चुनाव के दीर्घकालिक प्रभावों पर विशेषज्ञों से चर्चा की। बैठक में चुनावी खर्च, जनशक्ति की बचत और प्रशासनिक व्यवस्था पर इसके असर का आकलन किया गया।

एक राष्ट्र एक चुनाव पर jpc की बैठक दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक प्रभावों और चुनावी खर्च पर हुई चर्चा

JPC Reviews Long-Term Socio-Economic Impact of One Nation, One Election |

नई दिल्ली। संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने शुक्रवार को 'संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024' और 'केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024' की समीक्षा के लिए बैठक की। इस दौरान समिति ने विषय विशेषज्ञों के साथ चर्चा की और राष्ट्रीय, राज्य तथा केंद्र शासित प्रदेशों के चुनाव एक साथ कराने के दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का आकलन किया। बैठक में अलग-अलग समय पर चुनाव कराने से होने वाले वित्तीय खर्च, प्रशासनिक व्यस्तता और सुरक्षा बलों की तैनाती जैसे मुद्दों पर विचार किया गया। समिति के सामने यह तर्क रखा गया कि बार-बार चुनाव होने से सरकारी संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है और निजी कॉर्पोरेट निवेश भी हतोत्साहित होता है।

अलग-अलग चुनाव कराने से बढ़ता है वित्तीय खर्च

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष एस. महेंद्र देव ने अलग-अलग चुनाव कराने की व्यवस्थागत कमियों पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि अलग-अलग चुनाव कराने की कुल लागत केवल मतदान प्रक्रिया पर होने वाले खर्च तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसके व्यापक आर्थिक प्रभाव भी होते हैं।

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि 2014 के लोकसभा चुनावों के तुरंत बाद पांच प्रमुख क्षेत्रों में अलग से विधानसभा चुनाव कराने पर 811.1 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। वहीं, इन्हीं क्षेत्रों में लोकसभा चुनाव कराने का खर्च 838.7 करोड़ रुपये था। इस तरह अलग विधानसभा चुनाव कराने पर लगभग 96.7 प्रतिशत अतिरिक्त खर्च हुआ।

एक साथ चुनाव कराने से 28 प्रतिशत कम होगी पोलिंग स्टाफ की जरूरत

बैठक में बताया गया कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने से लॉजिस्टिक्स और जनशक्ति के स्तर पर काफी बचत हो सकती है। प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, एक साथ चुनाव कराने पर पोलिंग स्टाफ की जरूरत में 28 प्रतिशत तक कमी आ सकती है।

इससे पांच साल के चुनावी चक्र में सार्वजनिक क्षेत्र के 1.04 करोड़ 'पर्सन-डेज' की बचत होने का अनुमान बताया गया। समिति के सामने रखे गए तर्कों में इसे प्रशासनिक संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल से जोड़कर देखा गया।

सुरक्षा बलों को आंतरिक सुरक्षा पर ध्यान देने का मिलेगा अवसर

JPC के समक्ष यह भी बताया गया कि एक साथ चुनाव कराने से केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) और राज्य सशस्त्र पुलिस बलों को लंबे समय तक चलने वाले चुनावी प्रचार और सुरक्षा तैनाती से राहत मिल सकती है। इससे सुरक्षा बल अपने मुख्य कार्य यानी आंतरिक सुरक्षा पर बेहतर तरीके से ध्यान केंद्रित कर सकेंगे। इसके अलावा, 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' की धारा 135B के तहत मिलने वाली सवेतन चुनावी छुट्टियों को भी एक साथ किया जा सकेगा।

कंपनियों को अलग-अलग चुनावी छुट्टियों से मिलेगी राहत

चर्चा के दौरान बताया गया कि अलग-अलग चुनावों के कारण कंपनियों को दो अलग-अलग सवेतन गैर-कार्य दिवस (Non-working Days) देने पड़ सकते हैं। यदि चुनाव एक साथ होते हैं, तो इन छुट्टियों को एक साथ किया जा सकेगा। इससे कंपनियों को अलग-अलग चुनावों के लिए बार-बार सवेतन छुट्टियों की व्यवस्था करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। समिति के सामने इसे एक साथ चुनाव कराने से होने वाली संभावित बचत के रूप में प्रस्तुत किया गया।

चुनाव से पहले सरकारी नीतियों में बदलाव का मुद्दा उठा

एस. महेंद्र देव ने नीतिगत विकृतियों का मुद्दा उठाते हुए कई अध्ययनों का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि राज्य सरकारें चुनाव से पहले अहम मतदाता समूहों को आकर्षित करने के लिए कई बार वस्तुओं पर मिलने वाले कर राजस्व में कटौती करती हैं, बिजली की आपूर्ति को दूसरी तरफ मोड़ती हैं और किसानों का कर्ज माफ करती हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि चुनाव से ठीक पहले शुरू की गई बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के पूरा होने की दर में उस समय भारी गिरावट आती है, जब सत्ता में मौजूद सरकार बदल जाती है। JPC की बैठक में इन पहलुओं को एक साथ चुनाव कराने के संभावित दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक प्रभावों के आकलन से जोड़कर देखा गया। (Source: ANI)

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