रूसी तेल में कटौती से भारत के तेल बिल और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों ने जल्दबाजी से बचने और व्यापारिक विकल्प बढ़ाने की सलाह दी है।
नई दिल्ली: अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा ने कहा है कि रूस से तेल की खरीद में 50 प्रतिशत की कमी से भारत का वार्षिक तेल आयात बिल 5-10 अरब अमेरिकी डॉलर तक बढ़ सकता है। ऐसे में महंगाई भी बढ़ सकती है। यह बात उन्होंने रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर दंडात्मक शुल्क लगाने के अमेरिकी प्रस्ताव के बीच कही है। मेहरोत्रा ने कहा कि रूस पर भारत की निर्भरता, जो उनके अनुमान के अनुसार, देश के तेल आयात का लगभग 50 प्रतिशत है, को खरीद में किसी भी कमी के आर्थिक प्रभाव का आकलन करते समय ध्यान में रखना आवश्यक है।
पूरे साल के तेल आयात बिल पर 5-10 अरब डॉलर का पड़ेगा असर
मेहरोत्रा ने एएनआई को बताया, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम ट्रंप के साथ बातचीत कैसे कर पाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि रूस अंतरराष्ट्रीय कीमतों की तुलना में भारत को कम कीमत पर कच्चा तेल भी उपलब्ध कराता है। उन्होंने कहा कि खरीद में 50 प्रतिशत की कमी का भारत के तेल आयात बिल पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा। मेहरोत्रा ने कहा, अगर हमें अपनी खरीद में 50 प्रतिशत की कमी करनी पड़ी तो इससे पूरे साल के तेल आयात बिल पर 5-10 अरब डॉलर का असर पड़ेगा।
मुद्रास्फीति में लगभग 0.3 प्रतिशत की हो सकती है वृद्धि
उन्होंने अनुमान लगाया कि इस तरह के कदम से मुद्रास्फीति में लगभग 0.3 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है, जबकि अगर सरकार ईंधन की बढ़ी हुई कीमतों का बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डालती है तो उसे अतिरिक्त दबाव का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा, अगर सरकार हम पर पेट्रोल और डीजल की कीमतें नहीं बढ़ाती है, तो हम गुजारा कर पाएंगे, लेकिन इसके परिणाम सरकार को भुगतने होंगे। मेहरोत्रा ने यह भी चेतावनी दी कि रूस से तेल की खरीद में भारी कमी से भारत का चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ सकता है, जो उनके अनुसार हाल के वर्षों में GDP के लगभग 0.6-0.7 प्रतिशत के आसपास रहा है।
मेहरोत्रा ने चेतावनी देते हुए कहा...
उन्होंने कहा, अगर रूस से हमारी खरीद 50 प्रतिशत कम हो जाती है, तो जाहिर है कि हमारा चालू खाता घाटा तेजी से बढ़ेगा, इसलिए इसका असर हमारी विकास दर पर भी पड़ेगा। उन्होंने आगे चेतावनी दी कि अगर भारत और चीन जैसे प्रमुख खरीदारों को रूसी तेल की आपूर्ति में काफी कमी आती है तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। मेहरोत्रा ने कहा, रूस तेल का एक प्रमुख उत्पादक और विक्रेता है। अगर रूस का तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में नहीं आता है, तो तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ जाएंगी। उन्होंने कहा कि वैश्विक तेल की बढ़ती कीमतों से भारत समेत अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा और इसलिए अमेरिकी टैरिफ प्रस्ताव पर सरकार की प्रतिक्रिया में इसे ध्यान में रखा जाना चाहिए।
भारत में तेल की खरीद कम करने में नहीं करनी चाहिए जल्दबाजी
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि भारत को केवल अमेरिका को खुश करने के लिए रूसी तेल की खरीद कम करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए, खासकर तब जब वाशिंगटन को नई दिल्ली के साथ व्यापार संबंधी कई अन्य चिंताएं हैं। उन्होंने कहा, भारत को और अधिक बाजारों की ओर रुख करना चाहिए, क्योंकि हमारे सामने कई मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) हैं। व्यापार के लिए अमेरिका पर अत्यधिक निर्भर रहने के बजाय हमें अपने बाजार का विविधीकरण करना चाहिए। यही नई रणनीति होनी चाहिए।
रूसी कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता जुलाई में 50 प्रतिशत से अधिक हुई
श्रीवास्तव ने एएनआई को बताया, उन्होंने कहा कि खाड़ी देशों के पारंपरिक स्रोतों से आपूर्ति में व्यवधान के कारण रूसी कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता 2022 में लगभग 15 प्रतिशत से बढ़कर पिछले वित्त वर्ष में लगभग 30 प्रतिशत और जुलाई में 50 प्रतिशत से अधिक हो गई है।
श्रीवास्तव ने दीर्घकालिक कच्चे तेल आपूर्ति व्यवस्था की वकालत करते हुए कहा, भारत को रूस को सबसे भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता मानना चाहिए। उसे एक दीर्घकालिक रणनीति बनानी चाहिए, तभी उसे बेहतर छूट मिलेगी।
व्यापार तनाव के बीच 'वेट एंड वॉच' की सलाह
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि रूसी तेल की खरीद कम करने से वाशिंगटन के साथ व्यापक व्यापार तनाव का समाधान नहीं हो सकता है।
उन्होंने कहा, मान लीजिए कि हम रूस से तेल खरीदना बंद कर देते हैं। क्या इससे अमेरिका से शांति मिल जाएगी? नहीं। उनके पास हमें दंडित करने के लिए 10 और तरीके हैं। एसएमसी ग्लोबल सिक्योरिटीज लिमिटेड में कमोडिटी रिसर्च की एवीपी वंदना भारती ने कहा कि भारत को प्रतीक्षा करो और देखो का दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, क्योंकि इस मुद्दे पर अमेरिकी बयान लगातार बदल रहे हैं। भारती ने कहा, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकताएं बनी हुई हैं, जिससे लंबे समय से चल रहे भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारत के लिए रूसी तेल का निरंतर आयात महत्वपूर्ण हो जाता है।
रूसी तेल आयात में अस्थायी गिरावट संभव, भारत के पास व्यापार के कई विकल्प
उन्होंने कहा कि रूस से भारत के कच्चे तेल के आयात में अल्पावधि में गिरावट आ सकती है, लेकिन दीर्घावधि में यह महत्वपूर्ण बना रहने की संभावना है। भारती ने यह भी कहा कि अमेरिका के व्यापारिक दबावों का मुकाबला करने के लिए भारत के पास यूरोपीय संघ, मध्य पूर्व और अन्य देशों के साथ समझौतों सहित वैकल्पिक व्यापारिक विकल्प मौजूद हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि भारत को तेल आयात बिल, मुद्रास्फीति, चालू खाता घाटा और आर्थिक विकास पर संभावित दबाव के लिए तैयार रहते हुए ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ टैरिफ जोखिमों को संतुलित करने की आवश्यकता है।
(इनपुट: ANI)
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