सुप्रीम कोर्ट ने PCPNDT एक्ट के तहत FIR और पुलिस जांच को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि जांच एक्ट में तय विशेष प्रक्रिया के तहत होगी।
नई दिल्ली (भारत)। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि प्री-कॉन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स (प्रोहिबिशन ऑफ सेक्स सेलेक्शन) एक्ट, 1994 के तहत अपराधों के लिए सिर्फ इसलिए FIR दर्ज नहीं की जा सकती क्योंकि वे संज्ञेय और गैर-जमानती हैं। कोर्ट ने कहा कि विशेष कानून के तहत बनाई गई प्रवर्तन व्यवस्था ही लागू होगी।
विशेष कानून की प्रक्रिया को मिलेगी प्राथमिकता
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंग्मीकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि PCPNDT एक्ट के तहत बनाई गई विशेष प्रवर्तन व्यवस्था को सामान्य पुलिस जांच प्रक्रिया से बदला नहीं जा सकता। कोर्ट के मुताबिक एक्ट में जांच और अभियोजन के लिए विशेष प्रक्रिया निर्धारित है। इसी प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
Appropriate Authority करेगी अपराधों की जांच
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि PCPNDT एक्ट के तहत अपराधों की जांच Appropriate Authority के अधिकार क्षेत्र में आती है। संसद ने इस कानून के तहत जांच के लिए विशेष प्रक्रिया निर्धारित की है। इसलिए सामान्य पुलिस जांच प्रक्रिया को अपनाकर विशेष व्यवस्था को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
मजिस्ट्रेट पुलिस चार्जशीट पर संज्ञान नहीं ले सकता
कोर्ट ने कहा कि PCPNDT एक्ट के तहत मजिस्ट्रेट केवल पुलिस चार्जशीट के आधार पर अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता। एक्ट की धारा 28 के तहत निर्धारित शिकायत जरूरी है। इसी शिकायत के आधार पर मजिस्ट्रेट अपराध का संज्ञान ले सकता है। पुलिस रिपोर्ट इस वैधानिक शिकायत का विकल्प नहीं हो सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने तीन अहम सवालों पर दिया जवाब
मामले में कोर्ट ने तीन प्रमुख सवालों पर विचार किया। इनमें संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध होने के आधार पर FIR दर्ज करने, पुलिस द्वारा जांच करने और पुलिस चार्जशीट के आधार पर मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने का मुद्दा शामिल था। सुप्रीम कोर्ट ने तीनों सवालों का जवाब विशेष वैधानिक व्यवस्था के पक्ष में दिया।
संज्ञेय और गैर-जमानती होने से पुलिस को असीमित अधिकार नहीं
FIR के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि धारा 27 में अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती बताने से पुलिस को स्वतः असीमित अधिकार नहीं मिल जाते। जब विशेष कानून खुद जांच और अभियोजन के लिए अलग व्यवस्था तय करता है, तो उसी व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाएगी। Appropriate Authority विशेष प्रक्रिया के तहत उल्लंघनों की जांच करेगी।
गंभीर स्थिति में पुलिस की मदद ली जा सकती है
नियम 18A(3)(iv) पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा कि जांच में पुलिस की भागीदारी से जहां तक संभव हो बचना चाहिए। हालांकि, वास्तविक गंभीर आपात स्थिति में पुलिस की सहायता ली जा सकती है। ऐसी सहायता तभी ली जाएगी जब वैधानिक जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से पूरा करने के लिए उसकी जरूरत हो।
पुलिस सहायता और पुलिस जांच अलग
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की सहायता और पुलिस जांच के बीच स्पष्ट अंतर किया। पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखने, तलाशी, जब्ती या सबूत नष्ट होने से रोकने में मदद कर सकती है। लेकिन इस तरह की सहायता से पुलिस को PCPNDT एक्ट के तहत निर्धारित जांच अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं मिलता।
धारा 28 की शिकायत जरूरी
संज्ञान के सवाल पर कोर्ट ने दोहराया कि पुलिस चार्जशीट धारा 28 के तहत जरूरी शिकायत की जगह नहीं ले सकती। इसलिए मजिस्ट्रेट केवल पुलिस रिपोर्ट के आधार पर PCPNDT एक्ट के अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता। कोर्ट ने इस तरह एक्ट में निर्धारित शिकायत-आधारित व्यवस्था को मजबूत किया है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से जुड़ा मामला
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट के 30 सितंबर 2024 के फैसले से जुड़ी अपील पर आया। उत्तर प्रदेश सरकार ने विशेष कानून के तहत पुलिस कार्रवाई पर लगाई गई पाबंदियों को चुनौती दी थी। इसी अपील में सुप्रीम कोर्ट के सामने पुलिस की भूमिका से जुड़े ये महत्वपूर्ण सवाल आए।
उत्तर प्रदेश ने FIR के पक्ष में दी दलील
उत्तर प्रदेश सरकार ने FIR दर्ज करने का बचाव करते हुए कहा था कि PCPNDT एक्ट की धारा 27 अपराधों को स्पष्ट रूप से संज्ञेय और गैर-जमानती बनाती है। राज्य का तर्क था कि ऐसी स्थिति में जांच के स्तर पर सामान्य आपराधिक प्रक्रिया लागू होनी चाहिए। इसी आधार पर पुलिस कार्रवाई की अनुमति देने की मांग की गई थी।
केंद्र ने भी सामान्य आपराधिक प्रक्रिया का मुद्दा उठाया
केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने कहा कि अपराधों के संज्ञेय होने के प्रावधान को अर्थहीन नहीं बनाया जा सकता। केंद्र ने तर्क दिया कि जब तक विशेष कानून सामान्य आपराधिक प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से बाहर नहीं करता, तब तक उसकी प्रासंगिकता बनी रहनी चाहिए।
विशेष प्रवर्तन व्यवस्था के पक्ष में दलील
विरोधी पक्ष ने कहा कि PCPNDT एक्ट Appropriate Authority पर केंद्रित एक पूर्ण और विशेष प्रवर्तन व्यवस्था बनाता है। उनका तर्क था कि पुलिस को बिना रोक-टोक जांच की अनुमति देने से समानांतर प्रवर्तन तंत्र तैयार होगा। इससे एक्ट में निर्धारित विशेष प्रक्रिया कमजोर हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष व्यवस्था को माना
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष वैधानिक व्यवस्था को स्वीकार करते हुए कहा कि PCPNDT एक्ट के तहत अपराधों की जांच और अभियोजन उसी विशेष प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए। कोर्ट ने सामान्य आपराधिक प्रक्रिया के जरिए एक्ट में निर्धारित व्यवस्था को दरकिनार करने की अनुमति नहीं दी।
मुख्य मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट भेजा गया
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य मामले को अपने द्वारा घोषित कानून के अनुरूप आगे विचार के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट को वापस भेज दिया। अब हाई कोर्ट को सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में तय कानूनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए मामले पर आगे विचार करना होगा।
कोर्ट की सहायता के लिए मुक्ता गुप्ता बनीं एमिकस क्यूरी
कार्यवाही के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश और वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया था। एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड नितिन सलूजा ने उनकी सहायता की। पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता प्रमोद कुमार दुबे, सिद्धार्थ अग्रवाल और अधिवक्ता विकल्प शर्मा से भी सहायता ली।
मामले में कई वरिष्ठ वकील हुए पेश
उत्तर प्रदेश की ओर से विश्व पाल सिंह, AOR, दिव्येश प्रताप सिंह, श्रीकांत सिंह, आकाश, सृजन शंकर कुलश्रेष्ठ, अमित कुमार, मनोज शर्मा और दानिश अल्वी पेश हुए। भारत संघ की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी के नेतृत्व में मधुलिका उपाध्याय, AOR और अन्य वकीलों ने पैरवी की।
एमिकस क्यूरी की टीम में ये वकील शामिल
मुक्ता गुप्ता की सहायता नितिन सलूजा, AOR, नित्या गुप्ता, विट्ठल बाला सुब्रमण्यम, इशिता सोनी, प्रणय मदान और करण सिंह ने की। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रमोद कुमार दुबे की सहायता विकल्प शर्मा और अन्य वकीलों ने की। विकल्प शर्मा और पलाश सोनी भी मामले में पेश हुए। (Source: ANI)
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