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सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: सोशल मीडिया पर बाल यौन शोषण सामग्री रोकने के लिए केंद्र को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर बाल यौन शोषण सामग्री (CSEAM) रोकने के लिए केंद्र सरकार और MeitY को नोटिस जारी किया। जानें क्या है पूरा मामला और JRCA की मांग।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख सोशल मीडिया पर बाल यौन शोषण सामग्री रोकने के लिए केंद्र को नोटिस

Supreme Court of India (FilePhoto) |

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से उस याचिका पर जवाब मांगा है जिसमें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के लिए कानून-प्रवर्तन एजेंसियों को बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री (CSEAM) की रिपोर्ट करने के निर्देशों को सख्ती से लागू करने की मांग की गई है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और के विनोद चंद्रन की बेंच ने शुक्रवार को 'जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस' (JRCA) की अर्जी पर इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और कानून और न्याय मंत्रालय को नोटिस जारी किया।

बीबीसी रिपोर्ट और इंस्टाग्राम विवाद से जुड़ा मामला

बेंच ने याचिकाकर्ता को संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को मामले में पक्षकार बनाने की अनुमति भी दी, ताकि कोर्ट के निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके। यह अर्जी एक बीबीसी रिपोर्ट के बाद दायर की गई थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि इंस्टाग्राम ने CSEAM को बढ़ावा देने वाले पेड विज्ञापन दिखाए थे। इसके बाद JRCA ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म द्वारा कानूनी दायित्वों और सुप्रीम कोर्ट के पिछले निर्देशों के पालन पर सवाल उठाए।

बच्चों के अधिकारों और POCSO एक्ट का गंभीर उल्लंघन

यह अर्जी एक बीबीसी रिपोर्ट के बाद दायर की गई थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि इंस्टाग्राम ने CSEAM को बढ़ावा देने वाले पेड विज्ञापन दिखाए थे। इसके बाद JRCA ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म द्वारा कानूनी दायित्वों और सुप्रीम कोर्ट के पिछले निर्देशों के पालन पर सवाल उठाए थे। इसमें कहा गया है कि इस अर्जी में शामिल मुद्दा किसी खास इंटरमीडियरी (मध्यस्थ) के कामकाज तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत में काम करने वाले सभी इंटरमीडियरीज और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लागू होने वाले कानूनी दायित्वों के एक समान कार्यान्वयन से जुड़ा है। इसमें आगे कहा गया है, "डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री का प्रसार, प्रकाशन, प्रचार या उससे कमाई करना अपराध है। यह पीड़ित बच्चों की गरिमा, गोपनीयता का उल्लंघन है और POCSO एक्ट, 2012 के मूल उद्देश्य के भी खिलाफ है।"

शीर्ष अदालत के पिछले निर्देश और 'सेफ-हार्बर' नियम

सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर, 2024 के अपने फैसले में कहा था कि इंटरमीडियरीज को 'बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण' (POCSO) एक्ट की धारा 19 से 21 और POCSO नियमों के नियम 11 के अनुसार कानून-प्रवर्तन एजेंसियों को CSEAM की रिपोर्ट करना आवश्यक है। शीर्ष अदालत ने सूचना प्रौद्योगिकी एक्ट की धारा 79 के तहत उपलब्ध 'सेफ-हार्बर' सुरक्षा के संबंध में भी इन दायित्वों पर विचार किया था।

सख्त प्रवर्तन ढांचे और एसओपी (SOP) की मांग

अधिक सुदृढ़ प्रवर्तन ढांचे की मांग करते हुए, JRCA ने कई उपाय प्रस्तावित किए हैं। इनमें यौन अपराधियों से संबंधित आपत्तिजनक सामग्री (CSEAM) का पता लगाने, रिपोर्ट करने और उसे सुरक्षित रखने के लिए इंटरमीडियरीज के लिए एक समान 'मानक संचालन प्रक्रिया' (SOP) और संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय शामिल है।

दोषियों पर कड़ी कार्रवाई और सेंट्रलाइज्ड सिस्टम की जरूरत

इस आवेदन में यह भी मांग की गई कि यौन अपराधियों की जानकारी को 'नेशनल डेटाबेस ऑफ सेक्सुअल ऑफेंडर्स' में तुरंत शामिल किया जाए, मध्यस्थों से मिली रिपोर्ट पर कानून लागू करने वाली एजेंसियां ​​तय समय में कार्रवाई करें, जो प्लेटफॉर्म अपनी कानूनी जिम्मेदारियों को पूरा नहीं करते उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई हो और ऐसी सामग्री की रिपोर्ट करने के लिए एक सेंट्रलाइज्ड ऑनलाइन सिस्टम बनाया जाए। JRCA ने कहा कि ऐसी सामग्री के लगातार ऑनलाइन प्रसार को रोकने के लिए इसे सख्ती से लागू करना जरूरी है।
​(भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)

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