ओवैसी और विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें फॉर्म 6 और तकनीकी प्रणालियों पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
नई दिल्ली। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उन्होंने चुनाव आयोग (EC) द्वारा मतदाता सूचियों के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) के तरीके को चुनौती दी है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब विपक्षी दल देश भर में इस प्रक्रिया को लेकर मुखर हैं।
इससे पहले लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) राहुल गांधी, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य विपक्षी नेताओं ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर कर प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाया था। विपक्षी याचिका में वोटर डेटाबेस और हटाए गए नामों की स्वतंत्र ऑडिट (Independent Audit) की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के खिलाफ याचिका
विपक्षी याचिका में सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति के गठन की मांग की गई है। यह समिति पुनरीक्षण अभ्यास के क्रियान्वयन और मतदाता सूचियों व इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) को नियंत्रित करने वाले तकनीकी प्रणालियों की जांच करेगी।
याचिकाकर्ताओं ने पहले मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) द्वारा अन्य चुनाव आयुक्तों की जानकारी या सहमति के बिना आयोग की सामूहिक शक्तियों के इस्तेमाल पर सवाल उठाए थे। उन्होंने राष्ट्रव्यापी SIR करने के निर्णय से जुड़ी फाइलों, बैठकों के विवरण (Minutes), नोटिंग और आपत्तियों समेत तमाम आधिकारिक रिकॉर्ड की मांग की है।
राहुल गांधी की ओर से दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि चुनाव आयोग को एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय के रूप में कार्य करना चाहिए। साथ ही, मतदाता सूचियों से संबंधित फैसले संविधान के अनुच्छेद 324 और 'मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023' के अनुरूप होने चाहिए।
फॉर्म 6 और डेटाबेस पर तकनीकी आपत्तियां
याचिका में 'ECINET' प्लेटफॉर्म पर ऑनलाइन फॉर्म 6 में किए गए बदलावों को लेकर गहरी चिंता जताई गई है। इसके तहत आवेदकों या उनके रिश्तेदारों के पिछले SIR मतदाता सूची में नाम होने से जुड़ी घोषणा को अनिवार्य किया गया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि यह अतिरिक्त आवश्यकता लागू नियमों में बिना किसी संशोधन के जोड़ी गई है, जिससे पात्र मतदाताओं, विशेषकर पहली बार मतदान करने वालों पर अनुचित दबाव पड़ रहा है।
याचिकाकर्ताओं ने ECINET और ERONET डेटाबेस के स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट की भी मांग की है। इसमें हटाए गए मतदाताओं की बूथ-वार जानकारी, नाम हटाने के ठोस कारण प्रकाशित करने और बिना नोटिस या पक्ष रखने का उचित अवसर दिए किसी भी मतदाता का नाम न हटाने के पुख्ता सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने की गुहार लगाई गई है।
इसके अलावा, याचिका में नाम हटाने के लिए फॉर्म 7 के जरिए बड़े पैमाने पर आपत्तियां दर्ज कराने और विशेष समुदायों व महिलाओं को निशाना बनाए जाने की आशंकाओं का भी जिक्र किया गया है। हालांकि, इन आरोपों पर अभी अदालत का निर्णय आना बाकी है। याचिका में चुनाव आयोग के उस जवाब का भी उल्लेख है जिसमें कहा गया था कि आयुक्तों के बीच मतभेद विचार-विमर्श की प्रक्रिया का हिस्सा थे और निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे।
ओवैसी का तीखा हमला और विरोध का अधिकार
इस बीच, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने लगातार SIR प्रक्रिया के संचालन पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून को रद्द करने की मांग करते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों को प्राप्त कानूनी सुरक्षा चुनाव आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को कमजोर करती है।
ओवैसी ने SIR प्रक्रिया को तत्काल रोकने की मांग करते हुए मतदाताओं पर थोपी गई अतिरिक्त शर्तों के औचित्य पर भी सवाल खड़े किए।
विरोध प्रदर्शन के अधिकार का पुरजोर समर्थन करते हुए AIMIM प्रमुख ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने खुद माना है कि विरोध करना एक मौलिक अधिकार है। लोग विरोध करेंगे और उन्हें करना भी चाहिए। यदि आप दिल्ली को बंद कर देंगे, तो क्या लोगों के विचारों और मस्तिष्कों को बंद कर सकेंगे? आप ऐसा कभी नहीं कर सकते। पूरी स्थिति को बेहद खराब तरीके से संभाला गया है।"
दिल्ली में CJP प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई
उधर, SIR को लेकर मचे सियासी घमासान के बीच दिल्ली में 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के विरोध प्रदर्शन के दौरान भी गहमागहमी रही। दिल्ली पुलिस ने 13 अक्टूबर को तीन कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया। उन पर आरोप है कि वे अनधिकृत रूप से डी-नोटिफाइड जंतर-मंतर विरोध स्थल में दाखिल हुए और पुलिसकर्मियों के कर्तव्यों में बाधा पहुंचाई।
दिल्ली पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तार कार्यकर्ताओं में सौरभ दास और आशुतोष रंका शामिल हैं, जिन्हें बुधवार को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। वहीं, तीसरे कार्यकर्ता अजिंक्य शिंदे को शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के छह महीने के मुचलके पर पाबंद किया गया है।
पुलिस का कहना है कि यह सख्त कार्रवाई सार्वजनिक शांति भंग करने, कानून की अवहेलना करने और सोशल मीडिया के जरिए अन्य लोगों को उकसाने के बार-बार किए जा रहे प्रयासों को रोकने के लिए की गई है। हालांकि, कार्यकर्ताओं के कानूनी प्रतिनिधियों ने इस पुलिसिया कार्रवाई के वैधानिक आधार पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह पूरा घटनाक्रम विपक्षी दलों द्वारा चुनाव आयोग के खिलाफ जारी देशव्यापी आंदोलन की पृष्ठभूमि में घटित हो रहा है।
(इनपुट: ANI)
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