उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता के यूजीसी 2026 नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद केंद्र सरकार समीक्षा के लिए एक विशेष समिति का गठन कर रही है।
नई दिल्ली। उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए लागू किए गए यूजीसी 2026 नियमों की समीक्षा के लिए केंद्र सरकार एक विशेष समिति का गठन कर रही है। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि इस कदम का उद्देश्य छात्रों की चिंताओं को दूर करना है।
कोर्ट ने व्यक्त की थी चिंता
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि सरकार ऐसा तंत्र तैयार कर रही है जिससे कोई भी वर्ग खुद को उपेक्षित या असुरक्षित महसूस न करे।
मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि इस पूरी कवायद में युवा पीढ़ी के कल्याण और सभी छात्रों के हितों को केंद्र में रखा जाना चाहिए।
2012 के नियम रहेंगे प्रभावी
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले जनवरी में 2026 के यूजीसी नियमों के क्रियान्वयन पर पूरी तरह से रोक लगा दी थी। कोर्ट ने माना था कि इन नियमों के प्रावधान प्रथम दृष्टया अस्पष्ट हैं और इनका दुरुपयोग हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि जब तक 2026 के नियमों की वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक 2012 के यूजीसी इक्विटी नियम ही प्रभावी रहेंगे।
अस्पष्ट भाषा पर कोर्ट की सख्ती
सीजेआई सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने जातिगत भेदभाव की परिभाषा पर सवाल उठाए थे। पीठ ने विशेष रूप से कहा था कि नियम 3 (सी) की भाषा अत्यंत अस्पष्ट है और इसमें संशोधन की आवश्यकता है।
अदालत ने टिप्पणी की कि स्कूल और कॉलेज समाज से अलग थलग रहकर काम नहीं कर सकते। अगर कैंपस के भीतर ऐसा माहौल बनेगा तो बाहर के समाज पर भी इसका असर पड़ेगा।
विशेषज्ञ समिति का सुझाव
याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर ध्यान देते हुए पीठ ने संकेत दिया कि वह यूजीसी को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दे सकती है। इस समिति में शिक्षाविद और कानूनविद शामिल होंगे और इसे अदालत की मंजूरी लेनी होगी।
इन नियमों के तहत एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्रों की शिकायतों के निवारण के लिए हेल्प लाइन और समितियां बनाना अनिवार्य किया गया था। इस नए नियम के खिलाफ राष्ट्रीय राजधानी में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे।
(इनपुट: ANI)
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