पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब असुरों के अत्याचार बढ़ने लगे, तब देवी शक्ति ने उग्र रूप धारण कर दुष्ट शक्तियों का संहार किया।
नई दिल्ली। मां दुर्गा के अनेक स्वरूपों में मां महाकाली का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उनका स्वरूप भले ही उग्र और भयावह दिखाई देता हो, लेकिन धार्मिक मान्यताओं में वे अपने भक्तों की रक्षक, दुष्ट शक्तियों का विनाश करने वाली और संसार को अधर्म से मुक्त कराने वाली आदिशक्ति मानी जाती हैं। मां महाकाली को समय, परिवर्तन, साहस और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक भी माना जाता है।
मां महाकाली के प्राकट्य की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब असुरों के अत्याचार बढ़ने लगे और देवताओं के लिए उनका सामना करना कठिन हो गया, तब देवी शक्ति ने अपने उग्र रूप में प्रकट होकर दुष्ट शक्तियों का संहार किया। मां महाकाली के प्राकट्य की कथा विशेष रूप से चंड-मुंड और रक्तबीज जैसे असुरों के वध से जुड़ी हुई है। देवी महात्म्य यानी दुर्गा सप्तशती में इन घटनाओं का विस्तार से वर्णन मिलता है। लेकिन आखिर मां महाकाली का प्राकट्य कैसे हुआ? उनका रंग काला क्यों बताया गया है? वे मुंडमाला और खड्ग क्यों धारण करती हैं? और भगवान शिव उनके चरणों के नीचे कैसे आए? आइए जानते हैं मां महाकाली के प्राकट्य और उनकी शक्ति से जुड़ी प्रमुख पौराणिक कथाएं।
मां महाकाली का प्राकट्य कैसे हुआ?
देवी महात्म्य के अनुसार, जब शुंभ और निशुंभ नामक असुरों ने अपनी शक्ति के बल पर देवताओं को पराजित कर दिया, तब देवताओं को स्वर्ग से वंचित होना पड़ा। असुरों के अत्याचार से परेशान होकर देवताओं ने देवी की आराधना की और उनसे रक्षा की प्रार्थना की। इसी दौरान शुंभ-निशुंभ ने देवी को अपने अधीन करने के उद्देश्य से दूत भेजे। देवी ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इससे क्रोधित होकर असुरों ने देवी पर आक्रमण करने का निर्णय लिया।
इस रूप का प्राकट्य केवल क्रोध का प्रतीक नहीं
जब चंड और मुंड नामक असुर अपनी विशाल सेना के साथ देवी का सामना करने पहुंचे, तब देवी चंडिका ने अत्यंत उग्र रूप धारण किया। मान्यता के अनुसार, उनके क्रोध से उनके ललाट से एक भयानक और शक्तिशाली देवी प्रकट हुईं। यही देवी महाकाली के रूप में प्रसिद्ध हुईं। दुर्गा सप्तशती में इस प्रकट हुए स्वरूप को काली कहा गया है। उनका रंग गहरा काला, नेत्र उग्र और स्वरूप अत्यंत प्रभावशाली बताया गया है। वे हाथों में खड्ग और पाश जैसे अस्त्र धारण किए हुए थीं। उनके गले में नरमुंडों की माला और शरीर पर व्याघ्रचर्म का वर्णन मिलता है। देवी के इस रूप का प्राकट्य केवल क्रोध का प्रतीक नहीं था, बल्कि उस समय की आवश्यकता के अनुसार दुष्ट शक्तियों का विनाश करने वाली दिव्य शक्ति का प्रकटीकरण भी माना जाता है।
मां महाकाली ने चंड और मुंड का वध क्यों किया?
मां महाकाली के प्राकट्य के बाद चंड और मुंड ने देवी पर आक्रमण किया। दोनों असुर अपनी विशाल सेना और शक्ति के कारण स्वयं को अजेय समझते थे। उन्होंने देवी को चारों ओर से घेरने का प्रयास किया, लेकिन देवी का उग्र स्वरूप देखकर भी वे पीछे नहीं हटे। इसके बाद युद्ध आरंभ हुआ। देवी ने असुरों की सेना का संहार किया और चंड-मुंड का सामना किया। पौराणिक वर्णन के अनुसार, देवी ने दोनों असुरों का वध करके उनके सिर चंडिका के सामने प्रस्तुत किए।
मां महाकाली का स्वरूप निर्णायक शक्ति का प्रतीक
चंड और मुंड का संहार करने के कारण देवी को चामुंडा नाम से भी जाना गया। यह प्रसंग दुर्गा सप्तशती के सातवें अध्याय में वर्णित है। इस कथा से जुड़ी धार्मिक मान्यता यह है कि जब अहंकार और अत्याचार अपनी सीमा पार कर जाते हैं, तब उनका अंत करने के लिए देवी शक्ति प्रकट होती है। मां महाकाली का स्वरूप इसी निर्णायक शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
(Disclaimer: Prime News इस लेख की पुष्टि नहीं करता। यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं एवं उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है।)
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