ज्येष्ठ पूर्णिमा पर श्रद्धा और विधि-विधान से पूजा करें, जानें शुभ मुहूर्त, धार्मिक महत्व और पूजा की सही विधि।
नई दिल्ली। सनातन धर्म में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा का अत्यंत विशेष और पवित्र स्थान है। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, माता उमा और चंद्र देव की उपासना का विधान है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, व्रत और दान-पुण्य करने से अक्षय फलों की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा का महत्व
हिंदू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा को कई स्थानों पर वट पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। जो सुहागन महिलाएं वट सावित्री के दिन किसी कारणवश बरगद (वट) के पेड़ की पूजा नही कर पाती हैं वो महिलाएं इस दिन बरगद (वट) के पेड़ की पूजा कर अपने पति की लंबी आयु और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन दान करने से पुण्य कई गुना बढ़ जाता है।
करें चंद्र देव, माता लक्ष्मी और माता उमा की पूजा
पूर्णिमा तिथि पर चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ उदित होते हैं, इसलिए इस दिन चंद्र देव को अर्घ्य देने से मानसिक शांति और तनाव से मुक्ति मिलती है। पूर्णिमा का दिन माता लक्ष्मी और माता उमा को बेहद प्रिय है। इस कारण ईस दिन इन देवियों की भी पूजा का विधान है।
पूजा की विधि और उपाय
इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगा या किसी अन्य पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए। यदि नदी में स्नान संभव न हो, तो घर पर ही जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्नान के पश्चात जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या धन का दान करें।
भगवान विष्णु की पूजा
घर के मंदिर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र को पीले पुष्प, फल और तुलसी दल अर्पित करें। इस दिन सत्यनारायण कथा सुनना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
चंद्र देव को अर्घ्य
रात्रि के समय जब चंद्रमा का उदय हों, तब उन्हें दूध और जल से अर्घ्य दें। इससे कुंडली के चंद्र दोष दूर होते हैं। पूजा के समय सात्विक विचारों और खानपान का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
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