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पितृ विसर्जन और मां दुर्गा का आगमन

महालया 2026: पितृ पक्ष का समापन और मां दुर्गा के आगमन का पर्व, जानिए इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

महालया सर्वपितृ अमावस्या के दिन मनाया जाता है, जो पितृ पक्ष के समापन और मां दुर्गा के पृथ्वी पर आगमन का प्रतीक है।

महालया 2026 पितृ पक्ष का समापन और मां दुर्गा के आगमन का पर्व जानिए इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

Mahalaya: end of Pitru Paksha and arrival of maa Durga | AI Image

नई दिल्ली। हिंदू धर्म में महालया का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना जाता है। यह दिन पितृ पक्ष के समापन और मां दुर्गा के आगमन का प्रतीक है। आश्विन माह की अमावस्या यानी सर्वपितृ अमावस्या के दिन महालया मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने सभी पूर्वजों का तर्पण और श्राद्ध कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। वहीं, बंगाल और मिथिला सहित कई क्षेत्रों में महालया के साथ ही मां दुर्गा के स्वागत और दुर्गा पूजा की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच जाती हैं।

पितृ पक्ष का अंतिम दिन महालया

महालया पितृ पक्ष का अंतिम दिन होता है। इस दिन उन सभी पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है, जिनका श्राद्ध उनकी निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया हो या जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो। इसी कारण इस तिथि को सर्वपितृ अमावस्या भी कहा जाता है। मान्यता के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक पितरों को जल अर्पित करने, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहता है। इस दिन लोग पवित्र नदियों और जलाशयों के किनारे तर्पण करते हैं।

ब्रह्ममुहूर्त में होता है 'चंडीपाठ'

महालया की सुबह पश्चिम बंगाल और बिहार के मिथिला क्षेत्र में एक बेहद प्रसिद्ध परंपरा देखने को मिलती है। लोग ब्रह्ममुहूर्त में उठकर 'चंडीपाठ' का पाठ करते और सुनते हैं। महिषासुर मर्दिनी स्त्रोत, मंत्र और भक्ति संगीत से जुड़ी इस प्रस्तुति को खास तौर पर महालया के अवसर पर सुना जाता है। आज भी प्रत्येक वर्ष ऑल इंडिया रेडिओ पर प्रसिद्ध उद्घोषक वीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज में 'चंडीपाठ' बजाया जाता है, जिसे सुनने की परंपरा कई दशकों से बंगाली और मैथिली संस्कृति का हिस्सा बन गई है। माना जाता है, कि महालया के दिन ब्रह्ममुहूर्त में मां दुर्गा, मां लक्ष्मी, मां सरस्वती और मां पार्वती का पृथ्वी पर आगमन होता हैं। इस आगमन की अगुवाई भगवान रेवंत करते हैं। बंगाल और मिथिला का पूरा क्षेत्र इस दिन मां दुर्गा के स्वागत में दुल्हन की तरह सज जाता है।

मां दुर्गा का मणिद्वीप से पृथ्वी की ओर यात्रा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महालया के दिन मां दुर्गा अपने मणिद्वीप से पृथ्वी की ओर अपनी यात्रा शुरू करती हैं। मान्यता है कि देवी अपने मायके यानी पृथ्वी लोक पर आती हैं और भक्तों को दर्शन देकर उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। इसी विश्वास के कारण महालया के बाद दुर्गा पूजा को लेकर उत्साह बढ़ जाता है। शहरों और कस्बों में पूजा पंडालों की सजावट, प्रतिमाओं की तैयारी और अन्य धार्मिक आयोजनों का काम अंतिम चरण पर होता है। महालया के दिन कुम्हार मां दुर्गा की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का काम करते हैं। मूर्तिकार प्रतिमाओं की रंगाई, सजावट, आभूषण और अन्य बारीकियों को पूरा करते हैं। बंगाली परंपरा में इस दिन प्रतिमा में आंखों का चित्रण यानी चक्षुदान किया जाता है, वहीं मैथिली परंपरा में प्रतिमा में आंखें सप्तमी की तिथि को दिया जाता है। प्रतिमा में आंख को छोड़कर बांकी सभी कार्य पूरे कर लिए जाते हैं।

महालया पर पितृ पक्ष का समापन और देवी आराधना का दौर शुरू

महालया के साथ पितृ पक्ष का समापन होता है और इसके बाद देवी आराधना का दौर शुरू हो जाता है। इसके बाद आने वाली शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। भारत में इसी क्रम में भव्य दुर्गा पूजा उत्सव की शुरुआत होती है। पंडालों में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। महालया का धार्मिक महत्व इसलिए भी खास है क्योंकि यह पितृ स्मरण के साथ मातृ शक्ति की उपासना का अवसर माना जाता है। एक ओर लोग अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं, वहीं दूसरी ओर मां दुर्गा के स्वागत की तैयारियां शुरू होती हैं। महालया भारतीय संस्कृति में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, आध्यात्मिक श्रद्धा और शक्ति की उपासना का संदेश देता है। महालया के साथ ही वातावरण में शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा की उमंग दिखाई देने लगती है।

(Script: Aashutosh kumar jha)

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