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श्रीमंदिर में देवस्नान पूर्णिमा की तैयारी पूरी

पुरी श्रीमंदिर में देवस्नान पूर्णिमा की तैयारी पूरी, भगवान के लिए ‘सेनापटा लागी’ परंपरा संपन्न

पुरी श्रीजगन्नाथ मंदिर में देवस्नान पूर्णिमा की तैयारियां पूरी हो गई हैं। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के लिए ‘सेनापटा लागी’ अनुष्ठान के साथ विशेष सुरक्षा परंपरा निभाई जा रही है।

पुरी श्रीमंदिर में देवस्नान पूर्णिमा की तैयारी पूरी भगवान के लिए ‘सेनापटा लागी’ परंपरा संपन्न

Puri Jagannath Temple ready for Devasnan Purnima rituals |

पुरी (ओडिशा)। श्रीजगन्नाथ मंदिर में देवस्नान पूर्णिमा की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं, जहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के लिए पारंपरिक अनुष्ठानों के तहत विशेष व्यवस्था की गई है। शनिवार को श्रीमंदिर में ‘सेनापटा लागी’ नीति संपन्न की जा रही है, जिसके माध्यम से भगवान के विग्रहों को स्नान यात्रा के दौरान सुरक्षा प्रदान की जाती है। इस अवसर पर मंदिर परिसर को भव्य रूप से सजाया गया है और विशेष धार्मिक परंपराओं के चलते श्रद्धालुओं के लिए दर्शन अस्थायी रूप से बंद रखे गए हैं।

पहंडी से पहले भगवान को सुरक्षित रखने की खास परंपरा

देवस्नान पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा पहंडी के जरिए स्नान मंडप में विराजमान होंगे। इससे पहले दैतापति सेवक भगवान के श्रीअंगों की सुरक्षा के लिए विशेष सेनापटा लागी अनुष्ठान करते हैं। इस दौरान लकड़ी के विशेष टुकड़ों और वस्त्रों की सहायता से भगवान के श्रीअंगों को इस तरह सुरक्षित किया जाता है कि पहंडी के दौरान किसी प्रकार की क्षति न पहुंचे।

विशेष कवच और लाल-सफेद वस्त्रों से भगवान के श्रीअंगों को किया जाता है सुरक्षित 

धार्मिक मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों के प्रेम में स्वयं उनके कंधों पर सवार होकर यात्रा करते हैं। इसलिए उनके दिव्य विग्रह की सुरक्षा के लिए यह परंपरा सदियों से निभाई जा रही है। बउल लकड़ी से बने विशेष कवच और लाल-सफेद वस्त्रों से भगवान के श्रीअंगों को सुरक्षित किया जाता है। यही प्रक्रिया भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा पर भी लागू होती है।

सेनापटा लागी सबसे महत्वपूर्ण और गुप्त नीतियों में से एक

सेनापटा लागी श्रीमंदिर की सबसे महत्वपूर्ण और गुप्त नीतियों में से एक मानी जाती है। मंदिर की परंपरा के अनुसार इस अनुष्ठान को केवल दैतापति और पति महापात्र सेवक ही संपन्न करते हैं। देवस्नान यात्रा और इसके बाद होने वाली श्रीगुंडिचा यात्रा में भगवान के श्रीअंगों की सुरक्षा के लिए यह नीति अनिवार्य मानी जाती है।

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