मान्यताओं के अनुसार जन्माष्टमी की रात श्रीकृष्ण के साथ माँ योगमाया भी माँ यशोदा के यहां कन्या के रूप में प्रकट हुईं थी, जिस कारण है, कि आज श्रीकृष्ण के साथ माँ योगमाया का भी जन्मोत्सव मनाया जाता है।
नई दिल्ली (भारत)। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के साथ-साथ उन दिव्य घटनाओं की भी याद दिलाता है, जिनके माध्यम से भगवान कृष्ण को कंस के अत्याचार से सुरक्षित गोकुल पहुंचाया गया। इन्हीं घटनाओं में योगमाया के प्राकट्य की कथा बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार भगवान विष्णु के कृष्ण अवतार के समय भगवती योगमाया ने भी पृथ्वी पर प्रगट हुई थीं। वो नंद और यशोदा के घर कन्या के रूप में प्रकट हुई थीं।
कंस को थी आठवीं संतान से मृत्यु की चिंता
पौराणिक कथा के अनुसार मथुरा का राजा कंस अपनी बहन देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में बंद कर चुका था। उसे आकाशवाणी के माध्यम से पता चला था कि देवकी की आठवीं संतान उसके विनाश का कारण बनेगी। इसी भय में कंस ने देवकी की संतानों को जन्म लेते ही मारना शुरू कर दिया। जब भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का समय निकट आया, तब भगवान विष्णु की सहायता के लिए भगवती योगमाया ने व्रज में नंद बाबा और यशोदा मैया के यहाँ पुत्री के रूप में प्रकट हुई।
एक ही रात हुआ कृष्ण और योगमाया का प्राकट्य
जन्माष्टमी की मध्यरात्रि में जब भगवान श्रीकृष्ण ने देवकी के गर्भ से जन्म लिया, उसी समय गोकुल में यशोदा के यहां भगवती के जन्म की कथा मिलती है। भगवान श्रीकृष्ण को कंस से बचाने के लिए वसुदेव नवजात कृष्ण को लेकर गोकुल पहुंचे और वहां उन्हें यशोदा के पास छोड़कर उस कन्या को अपने साथ मथुरा ले आए।
कसं ने भगवती को मरने का किया था प्रयास
जब कंस को पता चला कि देवकी की आठवीं संतान जन्म ले चुकी है, तो वह तुरंत कारागार पहुंचा। उसने उस नवजात कन्या को भी मारने का प्रयास किया। लेकिन जैसे ही उसने कन्या को पत्थर पर पटकना चाहा, वह उसके हाथ से छूट गई।
कंस के सामने प्रकट हुआ देवी का दिव्य स्वरूप
कथा के अनुसार कंस के हाथ से छूटते ही वह कन्या आकाश में पहुंची और अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हुई। वह साधारण बालिका नहीं, बल्कि आठ भुजाओं वाली देवी के रूप में दिखाई दीं। उन्होंने कंस को चेतावनी दी कि जिस बालक से उसे भय है, वह कहीं और जन्म ले चुका है और उसका विनाश निश्चित है। इसके बाद देवी वहां से अंतर्धान हो गईं।
विंध्याचल धाम में भगवती का निवास
हिंदू धार्मिक परंपराओं के अनुसार भगवती वहाँ से गायब होने के बाद विंध्याचल धाम चली आई और वहाँ भगवती अष्टभुजा देवी के स्वरूप में वाश करने लगीं। आज भी विंध्याचल धाम में निवास कर रही हैं। उन्हें केवल एक बालिका के रूप में नहीं, बल्कि देवी शक्ति के एक स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। योगमाया के विंध्य क्षेत्र में निवास करने के कारण उन्हें विंध्यवासिनी नाम से संबोधित किए जाने की मान्यता है।
योगमाया और श्रीकृष्ण की कथा का संबंध
भगवान श्रीकृष्ण और योगमाया के एक ही प्रगट होने एवं दोनों की मत के अदले-बदले जाने के कारण दोनों को भाई-बहन माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण और योगमाया के प्राकट्य को एक ही दिव्य योजना का हिस्सा माना जाता है। एक ओर श्रीकृष्ण का जन्म अधर्म और अत्याचार के अंत के लिए हुआ, वहीं दूसरी ओर योगमाया ने उस अवतार की लीला को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कथा के अनुसार योगमाया ने ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कीं, जिनसे वसुदेव नवजात कृष्ण को मथुरा से गोकुल ले जा सके। कारागार के पहरेदारों के सो जाने और घटनाओं के सहज रूप से घटित होने को भी इसी दिव्य लीला से जोड़ा जाता है।
योगमाया की कथा देती है विशेष संदेश
योगमाया की जन्मकथा केवल पौराणिक घटना के रूप में ही नहीं, बल्कि ईश्वर की शक्ति और धर्म की रक्षा के संदेश के रूप में भी देखी जाती है। कथा यह बताती है कि अत्याचार और अहंकार कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, सत्य और धर्म की शक्ति उससे बड़ी होती है। कंस ने अपनी शक्ति के बल पर देवकी की संतानों को समाप्त करने का प्रयास किया, लेकिन वह उस दिव्य योजना को रोक नहीं सका, जिसके तहत श्रीकृष्ण का अवतार होना था।
(Disclaimer: Prime News इस लेख की पुष्टि नहीं करता। यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं एवं उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है।)
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