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राखी के मंत्र में क्यों आता है राजा बलि का नाम?

रक्षाबंधन के मंत्र में क्यों आता है राजा बलि का नाम? जानिए मां लक्ष्मी और राजा बलि की पौराणिक कथा

रक्षाबंधन के प्रचलित मंत्र में राजा बलि का नाम रक्षा, वचन और संकल्प की भावना से जुड़ा माना जाता है, जबकि मां लक्ष्मी और राजा बलि की कथा इस पर्व की लोकप्रिय पौराणिक मान्यताओं में शामिल है।

रक्षाबंधन के मंत्र में क्यों आता है राजा बलि का नाम जानिए मां लक्ष्मी और राजा बलि की पौराणिक कथा

माँ लक्ष्मी राजा बलि को राखी बांधते हुए | AI Image

नई दिल्ली (भारत)। रक्षाबंधन को भाई-बहन के प्रेम और रक्षा के संकल्प का पर्व माना जाता है। इस दिन बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और उसकी सुख-समृद्धि व लंबी उम्र की कामना करती है। राखी बांधते समय एक प्रचलित मंत्र भी बोला जाता है—
                                                                                          “येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः। 
                                                                                           तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।”

इस मंत्र में राजा बलि का नाम आने के पीछे भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा बताई जाती है।

राजा बलि कौन थे?

पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा बलि असुरराज प्रह्लाद के पौत्र और विरोचन के पुत्र थे। वे बेहद शक्तिशाली होने के साथ-साथ दानवीर और वचन के पक्के माने जाते थे। उन्होंने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। देवताओं की स्थिति कमजोर होने पर भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे। वामन रूप में भगवान विष्णु ने बलि से तीन पग भूमि मांगी। राजा बलि ने वचन दे दिया। इसके बाद भगवान वामन ने विराट रूप धारण किया। दो पग में पृथ्वी और आकाश नापने के बाद तीसरे पग के लिए कोई स्थान नहीं बचा। तब राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। उनकी दानशीलता और वचनबद्धता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का अधिकार दिया।

मां लक्ष्मी ने राजा बलि को क्यों बांधी राखी?

इसी कथा से जुड़ी एक प्रसिद्ध मान्यता रक्षाबंधन से संबंधित है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु जब राजा बलि को दिए गए वचन के अनुसार पाताल लोक में रहने लगे तो माता लक्ष्मी को उनकी चिंता हुई। कथा के अनुसार माता लक्ष्मी ने राजा बलि को अपना भाई मानकर उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और बदले में उनसे भगवान विष्णु को अपने साथ ले जाने का वचन मांगा। राजा बलि ने माता लक्ष्मी को अपनी बहन के रूप में स्वीकार किया और भगवान विष्णु को उनके साथ जाने की अनुमति दे दी। इसी वजह से राजा बलि और माता लक्ष्मी की यह कथा रक्षाबंधन की लोकप्रिय पौराणिक कथाओं में शामिल है।

राखी बांधते समय बोला जाने वाला प्रचलित मंत्र है—

                “येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः।
                  तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”

इसका सामान्य अर्थ है— जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली दानवराज बलि को बांधा गया था, उसी रक्षा सूत्र से मैं तुम्हें बांधती हूं। हे रक्षासूत्र! तुम अपने संकल्प से विचलित मत होना।

रक्षाबंधन से जुड़ी कथा का संदेश

राजा बलि और माता लक्ष्मी की कथा में भाई-बहन के रिश्ते के साथ वचन निभाने, सम्मान और रक्षा के भाव को महत्व दिया गया है। यही भावना रक्षाबंधन के पर्व का मूल संदेश भी मानी जाती है। इसलिए राखी बांधते समय राजा बलि का नाम लेना केवल एक मंत्रोच्चार नहीं, बल्कि उस पौराणिक परंपरा का स्मरण माना जाता है जिसमें रक्षा सूत्र को प्रेम, विश्वास और वचनबद्धता का प्रतीक माना गया है।

(Disclaimer: Prime News इस लेख की पुष्टि नहीं करता। यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं एवं उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है।)

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