नवरात्रि के पहले दिन विधि-विधान से मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है, जो कि हिमालय की पुत्री और धैर्य, शक्ति व दृढ़ संकल्प की प्रतीक मानी जाती हैं।
नई दिल्ली (भारत)। मां शैलपुत्री नवदुर्गाओं में मां दुर्गा का प्रथम स्वरूप हैं, जिनकी पूजा नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना के साथ अत्यंत श्रद्धापूर्वक की जाती है। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लेने के कारण इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा, और इन्हें पार्वती एवं हेमवती के नाम से भी जाना जाता है। अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की पुत्री सती थीं और इनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। मां शैलपुत्री का स्वरूप बेहद शांत और दिव्य है; वे वृषभ (बैल) पर सवार रहती हैं, इसलिए उन्हें वृषारूढ़ा भी कहा जाता है। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित है तथा उनके मस्तक पर अर्धचंद्र विराजमान है। योग साधना में उन्हें मूलाधार चक्र की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है, जिनकी उपासना से साधक को स्थिरता, अटूट साहस, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
माता शैलपुत्री के मंत्र
बीज मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नमः।
ध्यान मंत्र: वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ॥
स्तुति मंत्र: या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
क्यों पड़ा मां का नाम शैलपुत्री?
'शैलपुत्री' दो शब्दों से मिलकर बना है—'शैल' और 'पुत्री'। संस्कृत में शैल का अर्थ पर्वत होता है और पुत्री का अर्थ बेटी। इस प्रकार शैलपुत्री का अर्थ है पर्वतराज की पुत्री। धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी ने पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में पुनर्जन्म लिया। इसी कारण उन्हें हिमालय की पुत्री अर्थात शैलपुत्री कहा जाने लगा। मां शैलपुत्री को पार्वती और हेमवती नामों से भी जाना जाता है। वे शक्ति, प्रकृति, धैर्य और दृढ़ संकल्प की प्रतीक मानी जाती हैं।
देवी शक्ति से अपने जीवन में साहस, धैर्य, सकारात्मकता और आध्यात्मिक उन्नति
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा के साथ देवी आराधना का आरंभ होता है। इस दिन घटस्थापना की जाती है और मां का आह्वान करके दीप, धूप, फूल, फल तथा नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा करके भक्त देवी शक्ति से अपने जीवन में साहस, धैर्य, सकारात्मकता और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद मांगते हैं। इस दिन साधक का मन मूलाधार चक्र में होता है।
मां शैलपुत्री के स्वरूप का महत्व
मां शैलपुत्री को प्रकृति, शक्ति और जीवन के मजबूत आधार का प्रतीक भी माना जाता है। उनके स्वरूप में कई विशेषताएं दिखाई देती हैं।
वाहन नंदी: मां शैलपुत्री वृषभ यानी बैल पर सवार रहती हैं। उनका वाहन नंदी शक्ति, स्थिरता और दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है।
त्रिशूल: उनके एक हाथ में त्रिशूल होता है, जो शक्ति और दुष्टता पर नियंत्रण का प्रतीक माना जाता है।
कमल का फूल: दूसरे हाथ में कमल होता है, जो पवित्रता और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है।
मस्तक पर अर्धचंद्र: उनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित रहता है, जो उनके दिव्य स्वरूप की पहचान है।
नवरात्रि के पहले दिन होती है मां शैलपुत्री की पूजा
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा के साथ देवी आराधना का आरंभ होता है। माँ अपने इस स्वरूप में जीवन के आरंभ को दर्शाती हैं। अपने इस स्वरूप में देवी विवाह के पूर्व के जीवन को दर्शाती हैं। मनुष्य के जीवन का चक्र भी इसी प्रकार से चलता है। इसीलिए नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा करके भक्त देवी आदिशक्ति से अपने जीवन में साहस, धैर्य, सकारात्मकता और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद मांगते हैं।
(Disclaimer: Prime News इस लेख की पुष्टि नहीं करता। यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं एवं उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है।)
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