लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में लंबे समय से पदोन्नति के लिए जद्दोजहद कर रहे हजारों तदर्थ कर्मचारियों को बड़ी राहत प्रदान की है।
लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में लंबे समय से पदोन्नति के लिए जद्दोजहद कर रहे हजारों तदर्थ कर्मचारियों को बड़ी राहत प्रदान की है। कोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि तदर्थ सेवा भी पदोन्नति में गिनी जाएगी और तदर्थ सेवा में नियुक्त कर्मचारी भी अन्य कर्मचारियों की तरह प्रोन्नति के हकदार होंगे। कोर्ट ने कहा कि कनिष्ठ को प्रमोशन, तो वरिष्ठ को भी मिलेगा और बाद में नियमितीकरण होने पर भी प्रमोशन मिलेगा।
सरकार की अपील खारिज
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के न्यायाधीश जस्टिस शेखर बी सराफ ने यह फैसला देते हुए राज्य सरकार की दो विशेष अपीलें खारिज कर दीं।
तदर्थ सेवा भी गिनी जाएगी
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के फैसले के अनुसार, उत्तर प्रदेश में यदि तदर्थ (Ad-hoc) नियुक्ति विधिसम्मत प्रक्रिया से हुई है और कर्मचारी लगातार सेवा में रहा है, तो वह नियमित कर्मचारियों की तरह ही प्रोन्नति (Promotion) का हकदार है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रोन्नति के लिए पात्रता (Eligibility) निर्धारित करते समय तदर्थ सेवा की अवधि को भी गिना जाना चाहिए।
कोर्ट ने क्या कहा
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सेवा मामले में दिए एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया विधि सम्मत रही हो और कर्मचारी लगातार सेवा में रहा हो तो उसकी तदर्थ सेवा को भी पदोन्नति के लिए गिना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी से कनिष्ठ कर्मी को पदोन्नति मिल चुकी है तो उसे भी उसी तिथि से पदोन्नति का अधिकार है, भले ही उसकी सेवा का नियमितीकरण बाद में हुआ हो।
क्या था पूरा मामला
न्यायमूर्ति Justice Shekhar B. Saraf और न्यायमूर्ति Justice Manjeev Shukla की खंडपीठ ने यह फैसला राज्य सरकार की दो विशेष अपीलों को खारिज करते हुए दिया। इस मामले में मूल याची अनिल कुमार और शैलेंद्र सिंह आवास एवं शहरी नियोजन विभाग में जेई के पद पर कार्यरत थे। दोनों वर्ष 1986 में जूनियर इंजीनियर के पद पर तदर्थ नियुक्त हुए थे और बाद में उनकी सेवाएं नियमित की गईं।
विवाद कैसे शुरू हुआ
मामले में विवाद तब हुआ जब इनके बाद नियुक्ति पाए कर्मचारियों को सहायक अभियंता पद पर 18 जनवरी 1995 से पदोन्नति दे दी गई और अन्य याचियों को इस लाभ से वंचित रखा गया। पहले एकल पीठ ने याचियों के पक्ष में फैसला सुनाया था जिसे राज्य सरकार ने विशेष अपील के माध्यम से चुनौती दी।
सरकार की दलील खारिज
सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि चूंकि याचियों की सेवाएं उस समय तक नियमित नहीं थीं इसलिए उन्हें पिछली तिथि से पदोन्नति नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि तदर्थ सेवाकाल को भी पदोन्नति के लिए गिना जाएगा।
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