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QR कोड से होगी बनारसी साड़ी की पहचान

अब QR कोड से होगी असली बनारसी साड़ी की पहचान, एक स्कैन से मिलेगी सारी डिटेल

काशी के बुनकरों ने असली बनारसी साड़ियों की पहचान सुनिश्चित करने और नकली साड़ियों के कारोबार पर रोक लगाने के लिए QR/बारकोड आधारित व्यवस्था शुरू की है।

अब qr कोड से होगी असली बनारसी साड़ी की पहचान एक स्कैन से मिलेगी सारी डिटेल

Authentic Banarasi sarees will be identified via QR codes |

वाराणसी: बनारसी साड़ी के नाम पर हो रही कालाबाजारी और पर्यटकों से ठगी रोकने के लिए काशी के बुनकरों ने बड़ी पहल की है। अब हर असली बनारसी साड़ी पर विशेष क्यूआर/बारकोड टैग लगाया जाएगा, जिसे मोबाइल ऐप से स्कैन करते ही साड़ी की पूरी जानकारी सामने आ जाएगी। इस नई व्यवस्था का उद्देश्य असली बनारसी साड़ी को पहचान दिलाना, बुनकरों को सीधा लाभ पहुंचाना और नकली कारोबार पर रोक लगाना है।

क्यूआर के मिलेगी ये जानकारी

सहकारिता समिति से जुड़े पदाधिकारी शैलेश सिंह ने बताया कि बारकोड केवल वास्तविक बुनकरों को ही जारी किया जा रहा है। ग्राहक खरीदारी के समय क्यूआर कोड स्कैन कर साड़ी के निर्माण की तारीख, बुनकर का नाम, पता, मोबाइल नंबर, इस्तेमाल किए गए धागे और यह साड़ी वास्तव में बनारस में बनी है या नहीं, इसकी जानकारी तुरंत प्राप्त कर सकेंगे।

बनारसी साड़ी के नाम पर सूरत में बनी साड़ियों की बिक्री में आई तेजी 

शैलेश सिंह ने बताया कि अगर स्कैन करने पर पूरा विवरण दिखाई देता है तो साड़ी प्रमाणिक बनारसी होगी, जबकि जानकारी न मिलने पर ग्राहक समझ सकेगा कि साड़ी नकली या बिना पंजीकरण की है। पिछले कुछ वर्षों में बनारसी साड़ी के नाम पर सूरत में बनी साड़ियों की बिक्री तेजी से बढ़ी है। 

नकली बनारसी साड़ियों को 8 से 10 हजार रुपये में बेचा जा रहा

बुनकरों का दावा है कि कम कीमत की साड़ियों को पर्यटकों को 8 से 10 हजार रुपये तक में बनारसी बताकर बेचा जा रहा है। इसका सबसे बड़ा नुकसान काशी के पारंपरिक बुनकरों को उठाना पड़ रहा है, जिससे उनकी आय प्रभावित हुई है और कई परिवार पलायन के लिए मजबूर हुए हैं।

30 प्रतिशत बुनकरों को क्यूआर कोड कराया जा चुका उपलब्ध

समिति के अनुसार, अब तक करीब 30 प्रतिशत बुनकरों को क्यूआर कोड उपलब्ध कराया जा चुका है। इसे तेजी से अन्य बुनकरों तक पहुंचाया जा रहा है। शैलेश सिंह ने दावा किया कि इस प्रणाली के जरिए एक हजार से अधिक ग्राहक प्रमाणित बनारसी साड़ियों की खरीदारी कर चुके हैं। बुनकरों का मानना है कि यह तकनीक केवल एक मोबाइल ऐप नहीं, बल्कि बनारसी साड़ी की पहचान, पारदर्शिता और काशी की सदियों पुरानी बुनकरी परंपरा को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

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