भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी में नए शैक्षणिक सत्र में शुरू किया गया 'स्कूल चलें हम' अभियान पहले ही चरण में प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ गया है।
भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी में नए शैक्षणिक सत्र में शुरू किया गया 'स्कूल चलें हम' अभियान पहले ही चरण में प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ गया है। जिला प्रशासन द्वारा बड़े स्तर पर 102 अधिकारियों की ड्यूटी स्कूलों में बच्चों से संवाद करने के लिए लगाई गई थी। पहले दिन तो जमीनी हकीकत उलट ही रही।
अधिकांश अधिकारी स्कूल नहीं पहुंचे
अभियान के तहत एसडीएम, तहसीलदार, आरटीओ और इंजीनियर जैसे 102 अफसरों को स्कूलों में जाकर क्लास लेनी थी। हालांकि, अधिकांश अधिकारी स्कूल पहुँचे ही नहीं।
सूचना नहीं मिलने की बात
कई अधिकारियों का कहना है कि उन्हें इस ड्यूटी के बारे में समय पर कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई। कुछ ने बताया कि उन्हें लिस्ट शनिवार सुबह मिली, जब वे पहले से अन्य कार्यक्रमों में व्यस्त थे।
स्कूल को नहीं पता कि कौन अधिकारी आ रहा है
सिर्फ अधिकारी ही नहीं, बल्कि कई सरकारी स्कूलों के प्रधानाध्यापकों (प्रिंसिपल्स) को भी यह नहीं पता था कि उनके स्कूल में कौन सा बड़ा अधिकारी आने वाला है। इस वजह से स्कूलों में कोई विशेष तैयारी नहीं की जा सकी।
प्रशासनिक तालमेल की कमी
कलेक्टर कार्यालय से लिस्ट तो जारी हुई, लेकिन अधिकारियों तक इसका सही समय पर न पहुँचना प्रशासनिक तालमेल की बड़ी कमी को दर्शाता है।
बच्चों का नामांकन बढाना व माहौल बनाना उद्देश्य
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा 1 अप्रैल से शुरू किए गए इस अभियान का मुख्य लक्ष्य सरकारी स्कूलों में बच्चों का नामांकन (Enrollment) बढ़ाना और शिक्षा के प्रति एक सकारात्मक माहौल बनाना था। 4 अप्रैल का दिन विशेष रूप से 'भविष्य से भेंट' कार्यक्रम के लिए तय किया गया था, जहाँ अधिकारियों को बच्चों के साथ अपने अनुभव साझा करने थे। प्रशासन की इस 'हवाई' तैयारी के कारण बच्चों से जुड़ाव बढ़ाने का शासन का नेक मकसद अधूरा रह गया और पूरी व्यवस्था की कमियां उजागर हो गईं।
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