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अधिक मास में परिवार ने निभाई मानवता की मिसाल...

अधिक मास में परिवार ने निभाई मानवता की मिसाल, नेत्र, त्वचा और देह दान कर दी प्रेरणादायी विदाई

इंदौर। सनातन परंपरा में अधिकमास (जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है) को दान, पुण्य, तप और निस्वार्थ सेवा...

अधिक मास में परिवार ने निभाई मानवता की मिसाल नेत्र त्वचा और देह दान कर दी प्रेरणादायी विदाई

अधिक मास में परिवार ने निभाई मानवता की मिसाल, नेत्र, त्वचा और देह दान कर दी प्रेरणादायी विदाई |

इंदौर। सनातन परंपरा में अधिकमास (जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है) को दान, पुण्य, तप और निस्वार्थ सेवा के लिए विशेष रूप से पवित्र माना गया है। इस पावन महीने में इंदौर में मानवता और सेवा की एक ऐसी अनूठी और अनुकरणीय मिसाल देखने को मिली है, जिसने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है।

प्रसिद्ध समाजसेवी हेमंत चौहान के दुखद निधन के बाद, उनके शोक संतप्त परिवार ने अत्यंत भावुक लेकिन साहसिक निर्णय लेते हुए उनके नेत्रदान, त्वचादान (स्किन डोनेशन) और संपूर्ण देहदान का संकल्प पूरा किया।

​पवित्र महीने में मानवता की बड़ी मिसाल

​आमतौर पर मृत्यु के बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों के तहत अंतिम संस्कार किया जाता है, लेकिन हेमंत चौहान के परिवार ने रूढ़ियों से ऊपर उठकर समाज कल्याण को प्राथमिकता दी। उन्होंने माना कि अंगदान और देहदान से बड़ा कोई पुण्य नहीं हो सकता, खासकर तब जब यह कार्य अधिकमास जैसे पवित्र समय में किया जा रहा हो।

अंगदान व देहदान से मिलेगा कई लोगों को नया जीवन

​परिवार की इस अनुकरणीय पहल के बाद डॉक्टरों की टीम द्वारा सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी की। इसके माध्यम से दो दृष्टिहीन लोगों के जीवन में फिर से उजाला आ सकेगा। त्वचा दान इसलिए क्योंकि गंभीर रूप से झुलसे (Burns) मरीजों के इलाज और उनकी जान बचाने में बेहद मददगार साबित होगी। हेमंत चौहान की पार्थिव देह को मेडिकल कॉलेज के छात्रों के शोध और अध्ययन (Medical Research) के लिए सौंप दिया गया है, ताकि भविष्य के डॉक्टर मानव शरीर को बेहतर ढंग से समझकर चिकित्सा क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर सकें।

​समाज के लिए प्रेरणादायी विदाई

​शोक की इस घड़ी में भी परिवार द्वारा लिए गए इस फैसले की शहर भर में चौतरफा सराहना हो रही है। इस भावुक विदाई ने समाज में अंगदान और देहदान के प्रति जागरूकता फैलाने का एक बहुत बड़ा संदेश दिया है। लोगों का कहना है कि हेमंत चौहान ने जीवन भर तो समाज की सेवा की ही, लेकिन जाते-जाते भी वे अपने शरीर के अंगों के रूप में दूसरों को जीवनदान दे गए।

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