नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध से दुनिया के तमाम देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ रहा है...
नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध से दुनिया के तमाम देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था भी इससे प्रभावित हुई है। प्रमुख वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी "मूडीज रेटिंग्स" (Moody's Ratings) ने इस स्थिति को देखते हुए चेतावनी जारी की है।
मूडीज ने कहा है कि मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध ने भारत की अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर दिए हैं। तेल आयात महंगा होने के कारण महंगाई बढ़ने और विकास दर धीमी होने की आशंका है। मूडीज रेटिंग्स (Moody's Ratings) ने आगाह किया है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो भारत के क्रेडिट प्रोफाइल पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इस स्थिति से निपटने के लिए, भारत सरकार ₹2 लाख करोड़ की सपोर्ट स्कीम पर विचार कर रही है।
"मूडीज रेटिंग्स" ने पश्चिम एशिया युद्ध के असर को देखते हुए चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत के आर्थिक वृद्धि दर अनुमान में 0.8 फीसदी की बड़ी कटौती की है। साथ ही, तेजी से महंगाई बढ़ने का अंदेशा भी जताया है। कुछ अन्य विशेषज्ञों के अनुसार, संघर्ष लंबा चलने पर भारत की GDP विकास दर में लगभग 1% तक की कमी आ सकती है।
मूडीज ने भारत पर अपनी साख परिदृश्य रिपोर्ट में कहा, पश्चिम एशिया में चल रहे सैन्य संघर्ष के भारत की अर्थव्यवस्था पर असर को देखते हुए चालू वित्त वर्ष के लिए आर्थिक वृद्धि दर अनुमान को 6.8 फीसदी से घटाकर 6 फीसदी किया गया है। संघर्ष के कारण न सिर्फ निजी उपभोग में कमी आएगी, बल्कि औद्योगिक गतिविधियां सुस्त होंगी और सकल निश्चित पूंजी सृजन में कमी आएगी। कीमतों में तेज उछाल से लागत बढ़ेगी, जिससे भारत की वृद्धि दर प्रभावित होगी।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत करीब 55 फीसदी कच्चा तेल और 90 फीसदी से अधिक तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) का आयात पश्चिम एशिया से करता है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के पास तनाव के कारण शिपिंग में बाधा आ रही है, जिससे माल ढुलाई महंगी हो गई है और भारत का आयात बिल बढ़ रहा है। इनपुट लागत में 15 से 40% तक की वृद्धि के कारण टेक्सटाइल, रसायन, और सीमेंट जैसे उद्योग प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में इस क्षेत्र में लंबे समय तक व्यवधान से आने में दिनों में परिवारों के लिए रसोई गैस (एलपीजी) की किल्लत हो जाएगी। ईंधन और परिवहन की लागत बढ़ेगी।
मूडीज ने कहा कि ऐसे में जब भारत उर्वरकों के लिए आयात पर निर्भर है, इसका प्रभाव खाद्य महंगाई पर भी देखने को मिलेगा। हालांकि, महंगाई अभी नियंत्रण में है, लेकिन भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण इसके बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है। इससे सरकार का खर्च बढ़ेगा और बजट की तुलना में राजस्व में कमी आएगी। राजस्व जुटाने की कमजोर क्षमता राजकोषीय गुंजाइश को सीमित करेगी। मूडीज का अनुमान है कि 2026-27 में औसत महंगाई बढ़कर 4.8 फीसदी के स्तर पर पहुंच जाएगी, जो 2025-26 में 2.4 फीसदी रही थी। भारत सरकार द्वारा राजस्व बढ़ाने के वैकल्पिक उपायों या खर्च में कटौती के अभाव में राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की गति को धीमा कर सकती है।
मूडीज का मानना है कि महंगाई का जोखिम फिर से बढ़ने और आर्थिक वृद्धि के मजबूत बने रहने के साथ आरबीआई 2026-27 में ब्याज (रेपो) दर को या तो स्थिर रखेगा या इसे धीरे-धीरे बढ़ाएगा। हालांकि, यह संघर्ष की अवधि और इसके खाद्य एवं ईंधन की महंगाई पर पड़ने वाले असर पर निर्भर करेगा। अगर रेपो दर बढ़ता है, तो लोगों पर ईएमआई का बोझ भी बढ़ेगा।
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