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टीएमसी नाम और चुनाव चिह्न पर विवाद

टीएमसी नाम और चुनाव चिह्न पर विवाद, सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग से मांगी अंतिम फैसले की समयसीमा

उच्चतम न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को तृणमूल कांग्रेस के नाम और 'जोड़ा घास फूल' चुनाव चिह्न विवाद पर अंतिम निर्णय लेने के लिए एक उचित समयसीमा बताने को कहा है।

टीएमसी नाम और चुनाव चिह्न पर विवाद सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग से मांगी अंतिम फैसले की समयसीमा

टीएमसी नाम और चुनाव चिह्न पर विवाद |

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को निर्वाचन आयोग से कहा कि वह तृणमूल कांग्रेस के दोनों विरोधी गुटों के भीतर पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न 'जोड़ा घास फूल' को लेकर जारी विवाद में अंतिम निर्णय लेने की समयसीमा से उसे अवगत कराये। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की खंडपीठ पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने निर्वाचन आयोग द्वारा तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न पर रोक लगाये जाने को चुनौती दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग से मांगी अंतिम फैसले की समयसीमा

शिवसेना से जुड़े विवाद में फैसला करने में हो रही देरी का ज़िक्र करते हुए खंडपीठ ने कहा कि इस विवाद का निपटारा जल्द से जल्द होना चाहिए। खंडपीठ ने निर्वाचन आयोग से एक उचित समयसीमा का सुझाव देने को कहा, जिससे कि दोनों पक्षों को अपने सबूत पेश करने का निष्पक्ष मौका मिल सके और आयोग किसी अंतिम फैसले तक पहुंच सके। उच्चतम न्यायालय ने निर्वाचन आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू से कहा कि वह तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न पर जारी विवाद पर अंतिम निर्णय लेने की समयसीमा से शीर्ष अदालत को अवगत कराए। न्यायालय ने बनर्जी की याचिका पर अगली सुनवाई के लिए 28 सितंबर की तारीख निर्धारित कर दी।

कपिल सिब्बल ने उठाए चुनाव आयोग के आदेश पर सवाल

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, यह पता लगाइए कि अंतिम निर्णय के लिए आपको कितना समय चाहिए? सिर्फ़ इसी सीमित मकसद के लिए। इतना उचित समय जिसमें दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का सही मौका मिले और आपको भी मामले पर विचार करने का समय मिल सके, लेकिन समय बहुत ज़्यादा भी न हो। बनर्जी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने निर्वाचन आयोग के अंतरिम आदेश के समय पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यह आदेश उपचुनाव की प्रक्रिया शुरू होने के बाद जारी किया गया। इस वजह से बनर्जी को कानूनी उपाय अपनाने का मौका नहीं मिल पाया। सिब्बल ने पूछा, क्या निर्वाचन आयोग मामलों में देरी कर सकता है। फिर चुनाव के बीच ऐसे आदेश जारी कर सकता है, यह जानते हुए कि मेरे पास कोई उपाय नहीं होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया पर की चर्चा

उन्होंने कहा कि यह विवाद जुलाई में निर्वाचन आयोग के पास पहुंचा था। आयोग चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही आदेश जारी कर सकता था। सिब्बल ने कहा, निर्वाचन आयोग का मकसद मुझे बिना किसी उपाय के छोड़ देना है। हालांकि, खंडपीठ ने सवाल किया कि जब दोनों गुटों के उम्मीदवारों से नामांकन मिले, जिनमें से हर कोई खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बता रहा था, तो निर्वाचन आयोग क्या कर सकता था। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि चुनाव का कार्यक्रम पहले ही अधिसूचित किया जा चुका है। इस चरण में अधिसूचित किए गए उपचुनावों के लिए निर्वाचन आयोग की अंतरिम व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि तत्काल मुद्दा यह था कि क्या आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले प्रथमदृष्टया संतुष्ट हो गया था कि दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को समान अवसर प्रदान करने के लिए एक अंतरिम व्यवस्था आवश्यक है।

अक्टूबर तक फैसले के आग्रह पर मुकुल रोहतगी ने जताई आपत्ति

सिब्बल ने कहा, इस पर बिल्कुल भी विचार नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि बनर्जी इस चरण में अंतरिम व्यवस्था को चुनौती नहीं देना चाहतीं, बल्कि उनका पीठ से आग्रह है कि वह निर्वाचन आयोग को अक्टूबर में मामले का निपटारा पूरा करने का निर्देश दे। उन्होंने पश्चिम बंगाल में होने वाले स्थानीय निकाय चुनाव की ओर भी इशारा किया। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले विरोधी गुट की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने पार्टी के चुनाव चिह्न से जुड़े पहले के विवादों में, जिनमें शिवसेना का मामला भी शामिल है। इसी तरह के अंतरिम आदेश जारी किए थे। न्यायमूर्ति बागची ने कहा, "श्रीमान, हमने देखा है कि शिवसेना में देरी का क्या नतीजा होता है।" हालांकि, रोहतगी ने कहा कि अक्टूबर की समयसीमा बहुत कम होगी तथा विरोधी गुट को अपना पक्ष रखने के लिए और समय मिलना चाहिए।

चुनाव आयोग ने लगाई थी रोक

ऋतब्रत गुट की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एन.के. कौल ने कहा कि इस विवाद में तथ्यों से जुड़े जटिल मुद्दे शामिल हैं। इसके लिए दोनों पक्षों से हलफनामों एवं सबूतों की जरूरत होगी। उन्होंने कहा कि उचित निर्णय के लिए एक महीना पर्याप्त नहीं होगा। निर्वाचन आयोग ने 17 सितंबर को दोनों विरोधी गुटों को आगामी उपचुनावों के लिए तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने से रोक दिया। अंतरिम व्यवस्था के तौर पर निर्वाचन आयोग ने ममता बनर्जी के गुट को "ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस" नाम और "फ़ुटबॉल खिलाड़ी" का चुनाव चिह्न दिया, जबकि ऋतब्रत बनर्जी के गुट को "डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' नाम और "लिफाफा" चुनाव चिह्न मिला।

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