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NTF सर्वे में सामने आईं छात्रों की कई चिंताएं

उच्च शिक्षा संस्थानों में बढ़ता मानसिक दबाव, NTF सर्वे में सामने आईं छात्रों की कई चिंताएं

नेशनल टास्क फोर्स की रिपोर्ट में देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक असहजता और कैंपस में भेदभाव से जुड़ी चुनौतियों को सामने रखा गया है।

उच्च शिक्षा संस्थानों में बढ़ता मानसिक दबाव ntf सर्वे में सामने आईं छात्रों की कई चिंताएं

NTF सर्वे में सामने आईं छात्रों की कई चिंताएं (File Photo) |

नई दिल्ली: देश के प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और कैंपस के माहौल को लेकर 'नेशनल टास्क फोर्स' के सर्वे में कई अहम बातें सामने आई हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित इस टास्क फोर्स ने छात्रों के साथ-साथ शिक्षकों, अभिभावकों और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विशेषज्ञों की राय भी जुटाई। सर्वे में IIT, IIM और केंद्रीय विश्वविद्यालयों जैसे संस्थानों को शामिल किया गया।

लाखों लोगों से जुटाई गई जानकारी

NTF के अध्ययन में करीब 2.43 लाख विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से जानकारी ली गई। इसका मकसद यह समझना था कि उच्च शिक्षा के परिसरों में छात्रों को पढ़ाई, सामाजिक माहौल और मानसिक स्वास्थ्य के स्तर पर किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सर्वे में शामिल करीब 34 प्रतिशत छात्रों ने बताया कि उन्हें परिसर में पूरी तरह अपनापन महसूस नहीं होता। कुछ छात्रों के लिए कैंपस का माहौल सामाजिक और भावनात्मक रूप से असहज होने की वजह बन रहा है। रिपोर्ट में इसे छात्रों के शैक्षणिक अनुभव और संस्थान से उनके जुड़ाव से जोड़कर देखा गया है।

भाषा भी बन रही चुनौती

रिपोर्ट में भाषा से जुड़े अनुभवों को भी महत्वपूर्ण माना गया है। अंग्रेजी के अधिक इस्तेमाल वाले परिसरों में हिंदी या दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं से आने वाले छात्रों को कई बार अपनी पृष्ठभूमि के कारण असहजता महसूस हो सकती है। ऐसे अनुभव छात्रों के आत्मविश्वास और कक्षा में सक्रिय भागीदारी पर असर डाल सकते हैं।

छात्रों और फैकल्टी के प्रतिनिधित्व में अंतर

NTF ने संस्थानों में सामाजिक प्रतिनिधित्व के अंतर की ओर भी ध्यान दिलाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, आरक्षित वर्गों से आने वाले छात्रों की संख्या और फैकल्टी के सामाजिक प्रतिनिधित्व के बीच अंतर दिखाई देता है। ऐसे अंतर का असर छात्रों और शिक्षकों के बीच संवाद और संस्थान में उनके सहज जुड़ाव पर पड़ सकता है। उच्च अंक, बेहतर रैंक और आकर्षक प्लेसमेंट हासिल करने की होड़ भी छात्रों के लिए दबाव का कारण बन रही है। रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि लगातार बेहतर प्रदर्शन करने की अपेक्षा और करियर को लेकर अनिश्चितता छात्रों के मानसिक तनाव को बढ़ा सकती है।

15 प्रतिशत छात्रों ने बताई गंभीर मानसिक परेशानी

सर्वे में करीब 15 प्रतिशत छात्रों ने हाल के समय में गंभीर मानसिक परेशानी से गुजरने की बात कही। वहीं, लगभग 9 प्रतिशत छात्रों ने बार-बार आत्महत्या के विचार आने की जानकारी दी। यह स्थिति उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सहायता को मजबूत करने की जरूरत की ओर इशारा करती है। छात्रों की मानसिक परेशानियों को पहचानने और जरूरत पड़ने पर उचित मदद उपलब्ध कराने के मामले में भी संस्थानों के सामने चुनौती है। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 90 प्रतिशत फैकल्टी सदस्यों के पास मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को संभालने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण या संसाधन नहीं हैं। इसके अलावा, कई छात्रों को कैंपस में उपलब्ध काउंसलिंग सुविधाओं की जानकारी भी नहीं मिल पाती।

सुरक्षित और सहयोगी कैंपस पर जोर

NTF की रिपोर्ट उच्च शिक्षा संस्थानों में ऐसा माहौल विकसित करने की जरूरत बताती है, जहां छात्रों को मानसिक स्वास्थ्य सहायता आसानी से मिल सके और वे सामाजिक या भाषाई वजहों से खुद को अलग-थलग महसूस न करें। इसके लिए बेहतर काउंसलिंग व्यवस्था, फैकल्टी प्रशिक्षण और अधिक समावेशी कैंपस वातावरण को महत्वपूर्ण माना गया है।

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