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खाड़ी संकट से गहरा सकता है वैश्विक ऊर्जा संकट

खाड़ी संकट से वैश्विक स्तर पर गहरा सकता है ऊर्जा संकट

मिडिल ईस्ट में अमरिका और ईरान के बीच जारी तनाव और होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी को लेकर जल्द कोई समझौता नहीं होता तो पूरी दुनिया के समक्ष गंभीर ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है।

खाड़ी संकट से वैश्विक स्तर पर गहरा सकता है ऊर्जा संकट

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नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में अमरिका और ईरान के बीच जारी तनाव और होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी को लेकर जल्द कोई समझौता नहीं होता तो पूरी दुनिया के समक्ष गंभीर ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है। खाड़ी संकट की वजह से विश्व के तमाम देशों में कच्चे तेल का भंडार आठ साल के निचले स्तर के करीब पहुंच गया है। आपूर्ति बाधित होने से भंडार में लगातार गिरावट हो रही है। प्रमुख अमेरिकी बहुराष्ट्रीय निवेश बैंक और वित्तीय कंपनी "गोल्डमैन सैश" ने अपनी रिपोर्ट में इसका खुलासा किया है। इसी के साथ सिटी बैंक का अनुमान है कि हालात ऐसे ही रहे तो जून 2026 के अंत तक वैश्विक तेल भंडार में 900 मिलियन बैरल की गिरावट आ जाएगी।

तेल भंडार में गिरावट की बड़ी चिंता

"गोल्डमैन सैश" ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि खाड़ी संकट और होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण वैश्विक कच्चे तेल का भंडार आठ साल के निचले स्तर के करीब आ गया है। चिंता केवल भंडार घटने की नहीं है, बल्कि उसके तेजी से खत्म होने की रफ्तार की है।

आपूर्ति बाधित होने से बढ़ा दबाव

होर्मुज के कई महीनों से बाधित होने के कारण वैश्विक स्तर पर तेल आपूर्ति पर सीधा असर पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतें $120 प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं। इस भू-राजनीतिक अस्थिरता से आपूर्ति बाधित हुई है और कई देशों में मुद्रास्फीति का बड़ा खतरा मंडरा रहा है। प्रमुख तेल उत्पादक देशों में उत्पादन और निर्यात प्रभावित होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है।

केवल 101 दिनों का तेल शेष

"गोल्डमैन सैश" के मुताबिक, आपूर्ति संकट के कारण दुनिया के पास सिर्फ 101 दिनों की मांग के बराबर तेल बचा है। मई अंत तक यह घटकर 98 दिन रह सकता है। इस बीच पिछले 30 वर्षों में पहली बार, कुवैत ने अप्रैल महीने में कच्चे तेल का निर्यात लगभग शून्य कर दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण शिपमेंट भी ठप्प है। यदि जल्दी ही आपूर्ति सामान्य नहीं हुई, तो आने वाले महीनों में तेल बाजार पर दबाव और बढ़ सकता है।

रिफाइंड उत्पादों का संकट गहराया

रिपोर्ट के अनुसार सबसे बड़ी चिंता रिफाइंड उत्पादों को लेकर है। पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधन का वैश्विक भंडार युद्ध से पहले 50 दिनों की मांग के बराबर था, जो अब घटकर 45 दिन रह गया है। इसका मतलब है कि आसानी से उपलब्ध ईंधन का बफर तेजी से कम हो रहा है। खाड़ी संकट के कारण तेल की कीमतों में अस्थिरता से भारत के लिए जोखिम बढ़ा है।

आर्थिक मंदी का बढ़ता खतरा

गोल्डमैन सैश का मानना है कि इस गर्मी में भंडार पूरी तरह खत्म नहीं होगा, लेकिन मौजूदा रफ्तार वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरे का संकेत है। जानकारों का मानना है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं, जिससे मंदी का खतरा बढ़ सकता है।

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