SEBI ने अदानी समूह की कंपनियों द्वारा न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता के उल्लंघन के आरोप को खारिज कर दिया है।
नई दिल्ली (भारत)। बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने सोमवार को फैसला सुनाया कि अडानी समूह की चार कंपनियों के खिलाफ न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता (MPS) के उल्लंघन से संबंधित आरोप साबित नहीं हुए हैं। इस फैसले के साथ ही 2020 में शुरू हुई जांच समाप्त हो गई है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) को जून और जुलाई 2020 के दौरान कुछ शिकायतें मिली थीं, जिनमें अन्य बातों के अलावा, अडानी समूह की कुछ सूचीबद्ध कंपनियों द्वारा न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता (MPS) आवश्यकताओं का अनुपालन न करने का आरोप लगाया गया था।
2013 से 2018 के बीच अदानी समुह पर लगे आरोप
इसके बाद कारण बताओ नोटिस (SCN) जारी किया गया था। SCN में MPS मानदंडों और प्रतिभूति बाजार से संबंधित धोखाधड़ी और अनुचित व्यापार प्रथाओं के निषेध विनियम, 2003 (PFUTP विनियम) के कथित उल्लंघन से संबंधित आरोप लगाए गए थे। एससीएन में दावा किया गया था कि 2013 से 2018 के बीच अदानी एंटरप्राइजेज, अदानी पावर, अदानी पोर्ट्स एंड एसईजेड और अदानी ट्रांसमिशन (अदानी एनर्जी सॉल्यूशंस) में दो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा रखे गए शेयर असल में प्रमोटर होल्डिंग थे, लेकिन उन्हें सार्वजनिक शेयरहोल्डिंग के रूप में दिखाया गया था।
दो विदेशी निवेशकों के निवेश के निर्णय को नियंत्रित करने के आरोप
81 पेज के आदेश में, एसईबीआई ने कहा कि एससीएन में निहित एमपीएस मानदंडों और पीएफयूटीपी विनियमों के उल्लंघन के आरोप साबित नहीं हुए हैं और इस बात का कोई सबूत नहीं मिला है कि समूह के अध्यक्ष गौतम अदानी के भाई विनोद अदानी ने कथित तौर पर दो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को नियंत्रित किया था। एसईबीआई ने अपने आदेश में कहा, "यह माना गया है कि अदानी समूह की कंपनियों में दो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के निवेश की निर्णय लेने की प्रक्रिया में विनोद अदानी की संलिप्तता को प्रदर्शित करने वाला कोई सबूत नहीं है। इस प्रकार, यह माना गया है कि जांच यह साबित करने में सक्षम नहीं रही है कि विनोद अदानी ने अदानी समूह की कंपनियों में दो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के निवेश के निर्णय को नियंत्रित किया था।"
विनोद अडानी पर कारण बताओ नोटिस हुआ था जारी
कारण बताओ नोटिस (एससीएन) में विनोद अडानी पर उनके व्यापारिक संबंधों नासिर अली शबान अहली और चांग चुंग लिंग के माध्यम से नियंत्रण रखने का आरोप लगाया गया था। साथ ही, यह भी आरोप लगाया गया था कि अहली और लिंग ने चार निवेशकों को वित्तपोषण प्रदान किया था, जिन्होंने दो एफपीआई के माध्यम से अडानी समूह की कंपनियों में निवेश किया था। सेबी ने अपने आदेश में कहा, "यह माना गया है कि ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया है जिससे यह साबित हो सके कि विनोद अडानी ने श्री अहली या श्री लिंग को नियंत्रित किया और उनके माध्यम से चार निवेशकों के निवेश निर्णयों को प्रभावित किया। केवल व्यापारिक या वित्तीय संबंधों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि विनोद अडानी उन सभी को नियंत्रित करते हैं। इस तरह के किसी भी निष्कर्ष से पूंजी बाजार में विभिन्न प्रतिभूति कानूनों के कार्यान्वयन पर अनपेक्षित प्रभाव पड़ सकते हैं।"
शेयरधारिता से संबंधित एक समान आरोप खारिज
नियामक ने अडानी पावर में ओपल इन्वेस्टमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड की शेयरधारिता से संबंधित एक समान आरोप को भी खारिज कर दिया। आदेश में कहा गया है, "चूंकि एफपीआई और ओपल पर प्रभावी नियंत्रण का मूल आरोप स्थापित नहीं हुआ है, इसलिए न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता आवश्यकताओं के उल्लंघन से संबंधित परिणामी आरोप को भी स्वीकार नहीं किया गया है। यह माना गया है कि विनोद अडानी द्वारा दोनों एफपीआई के प्रबंधन या नीतिगत निर्णयों को प्रत्यक्ष रूप से निर्देशित करने का कोई सबूत नहीं है। एपीएल में ओपल के निवेश के संबंध में भी यही निष्कर्ष दर्ज किया गया है। यह भी देखा गया है कि ऐसा कोई आरोप नहीं है कि अडानी समूह की कंपनियों में निवेश के वित्तपोषण का स्रोत श्री विनोद अडानी थे। यदि ऐसा आरोप होता और इसे साबित करने के लिए सबूत होते, तो स्थिति अलग हो सकती थी।"
पर्याप्त सबूतों के अभाव में उल्लंघन के आरोप खारिज
एसईबीआई ने कहा कि चूंकि एफपीआई और ओपल पर प्रभावी नियंत्रण का मूल आरोप स्थापित नहीं हुआ है, इसलिए न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता आवश्यकताओं के उल्लंघन से संबंधित परिणामी आरोप को बरकरार नहीं रखा गया है। यह माना गया कि अडानी समूह की कंपनियों में निवेशकों के प्रबंधन या नीतिगत निर्णयों को प्रत्यक्ष रूप से निर्देशित करने के पर्याप्त सबूतों के अभाव में एमपीएस आवश्यकता का उल्लंघन स्थापित नहीं हुआ। एसईबीआई ने कहा कि चूंकि एमपीएस उल्लंघन का आरोप विफल हो जाता है, इसलिए पीएफयूटीपी विनियमों को लागू करने वाला बाद का आरोप भी मान्य नहीं रहता है। (इनपुट: ANI)
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