20 सालों में ब्रिक्स (BRICS) ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और ''डॉलर राज'' को कैसे चुनौती दी है? भारत, चीन और रूस की भूमिका के साथ-साथ इस बहुध्रुवीय मंच की सफलताओं और चुनौतियों का विस्तृत विश्लेषण पढ़ें।
नई दिल्ली। गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) के एक सामान्य शब्द 'ब्रिक' (BRIC) से शुरू हुआ सफर आज 20 साल बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था का सबसे शक्तिशाली समानांतर ढांचा बन चुका है। ब्रिक्स (BRICS) ने न केवल पश्चिमी देशों के एकाधिकार को चुनौती दी है, बल्कि दुनिया को एक बहुध्रुवीय (multipolar) आर्थिक विकल्प भी दिया है। हालांकि, कूटनीतिक जीत के बावजूद इसके भीतर गहराता चीनी प्रभाव और आपसी व्यापारिक एकीकरण (Economic Integration) की कमी अब भी इसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
एक 'अक्षर' से ग्लोबल सुपरपॉवर बनने तक का सफर
उभरती हुई चार अर्थव्यवस्थाओं- ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन- को परिभाषित करने के लिए गढ़े गए एक शब्द से शुरू हुआ यह समूह आज एक बड़ी भू-राजनीतिक और आर्थिक ताकत बन चुका है। विस्तार के साथ इस संगठन का स्वरूप भी बदला है। कभी यह उभरती ताकतों के बीच एक अनौपचारिक आर्थिक बातचीत का मंच था, लेकिन आज यह व्यापार, वित्त, विकास, तकनीक, सप्लाई चेन और वैश्विक शासन के बुनियादी ढांचे को तय करने वाला प्रमुख मंच बन गया है।
G7 को पछाड़ता ब्रिक्स का आर्थिक दबदबा
इस समूह का आर्थिक वजन अब नकारा नहीं जा सकता। आईएमएफ (IMF) के 2024 के आंकड़ों के अनुसार, क्रय शक्ति समानता (Purchasing Power Parity) के आधार पर वैश्विक जीडीपी में ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत हो गई है, जबकि इसके मुकाबले G7 देशों की हिस्सेदारी 29 प्रतिशत के आसपास है।
हालांकि, इस विशाल अर्थव्यवस्था की तुलना में ब्रिक्स देशों का आपसी व्यापार अब भी सीमित है। संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) के अनुमानों के मुताबिक, 2003 में ब्रिक्स सदस्यों के बीच का व्यापार 84 अरब डॉलर था, जो 13 गुना से अधिक बढ़कर 2024 में 1.17 ट्रिलियन डॉलर हो गया। लेकिन, इस भारी बढ़ोतरी के बावजूद, ब्रिक्स का आपसी व्यापार अभी भी कुल वैश्विक व्यापार का मात्र 5 प्रतिशत ही है।
रूस का 'विजन' और भारत की ग्लोबल साउथ कूटनीति
वरिष्ठ पत्रकार, शिक्षाविद् और शोधकर्ता आरएन भास्कर इसके उदय को स्पष्ट शब्दों में परिभाषित करते हैं। उन्होंने कहा, "ब्रिक्स गोल्डमैन सैक्स द्वारा गढ़ा गया एक कृत्रिम ढांचा था।" लेकिन यह नाम जल्द ही अपने रचयिताओं की मंशा से आगे निकलकर एक मजबूत राजनीतिक आकार लेने लगा। भास्कर इसका श्रेय रूस को देते हैं जिसने समय रहते इसकी क्षमता को पहचान लिया था। उन्होंने उल्लेख किया, "यह रूस था, जिसके पास इस परिकल्पना को एक मजबूत मंच में बदलने का विजन था।"
इसके बाद इस मंच ने धीरे-धीरे संस्थागत रूप ले लिया। 2010 में दक्षिण अफ्रीका इसका हिस्सा बना, और हालिया विस्तार में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, यूएई (UAE) और सऊदी अरब भी इसमें शामिल हो गए। यह विस्तार सिर्फ संस्थागत नहीं था, बल्कि यह बता रहा था कि दुनिया का आर्थिक केंद्र अब खिसक रहा है। आरएन भास्कर का मानना है कि भारत की शुरुआती भागीदारी भी ग्लोबल साउथ (Global South) के साथ उसके लंबे जुड़ाव और विकासशील देशों के बीच नेतृत्व की भूमिका निभाने की उसकी नीति से जुड़ी थी।
चीन का दबदबा और व्यापारिक एकीकरण की कमी
UNCTAD के मुताबिक, ब्रिक्स सदस्यों का वैश्विक कमोडिटी निर्यात 2003 के 1 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 2024 में लगभग 6 ट्रिलियन डॉलर हो गया। वैश्विक निर्यात में उनकी हिस्सेदारी 12 प्रतिशत से दोगुनी होकर 24 प्रतिशत हो गई। इस जबरदस्त उछाल के केंद्र में चीन है। UNCTAD के 2026 के एक अध्ययन के मुताबिक, आपसी ब्रिक्स व्यापार में चीन सबसे बड़ा निर्यातक और आयातक बना हुआ है। कई अन्य सदस्य देश अपने आयात-निर्यात के लिए पूरी तरह से चीनी बाजारों पर निर्भर हैं।
अर्थशास्त्री और आईआईएफटी (IIFT) के पूर्व वाइस चांसलर प्रो. मनोज पंत इस अंतर को अपने विश्लेषण के केंद्र में रखते हैं। उन्होंने कहा, "विश्व व्यापार के केंद्र में चीन है।" प्रो. पंत के अनुसार, ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार तो बढ़ा है, लेकिन यह किसी 'एकीकृत आर्थिक ब्लॉक' (Integrated Economic Bloc) के बनने का संकेत नहीं देता। इसका एक बड़ा हिस्सा ग्लोबल सप्लाई चेन में चीन की केंद्रीय भूमिका से जुड़ा है। उनका तर्क है कि छोटे उद्योगों के बीच गहरे संस्थागत और कारोबारी संबंधों का अभाव इस बाजार के विकास को सीमित कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया, "ब्रिक्स देशों के छोटे उद्योगों के बीच कोई संस्थागत जुड़ाव नहीं है।"
अमेरिकी प्रतिबंध बेअसर: डी-डॉलराइजेशन की राह
ब्रिक्स का सबसे ठोस योगदान 2014 में 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' (NDB) की स्थापना है। पारंपरिक ब्रेटन वुड्स (Bretton Woods) ढांचे से अलग यह बैंक बुनियादी ढांचे और स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण (Local-currency financing) पर जोर दे रहा है। 2025 में रियो में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भी स्थानीय मुद्रा में फंडिंग को मजबूत करने का समर्थन किया गया।
डॉलर का दबदबा कम करना (De-dollarization) ब्रिक्स का एक अहम राजनीतिक एजेंडा बन चुका है। आरएन भास्कर का मानना है कि अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों और डॉलर-आधारित वित्तीय प्रणाली के हथियार के रूप में इस्तेमाल ने देशों को विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया है।
आरएन भास्कर ने कहा, "ब्रिक्स की वजह से अमेरिकी प्रतिबंध काम नहीं कर रहे हैं। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद, ब्रिक्स के कारण ही यह निवेश प्लेटफॉर्म काम कर रहा है।" इसके साथ ही उन्होंने दावा किया, "अब अधिक से अधिक देश गैर-डॉलर मुद्राओं में लेनदेन करने के इच्छुक हो रहे हैं।"
भारत का व्यावहारिक दृष्टिकोण (2026 ब्रिक्स अध्यक्षता)
नई दिल्ली ने हमेशा पश्चिमी बाजारों और तकनीक से गहराई से जुड़े रहते हुए भी वैश्विक संस्थानों में उभरती अर्थव्यवस्थाओं के प्रतिनिधित्व का समर्थन किया है। 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत भारत का दृष्टिकोण मौजूदा सिस्टम से सीधे टकराव के बजाय 'व्यावहारिक आर्थिक सहयोग' पर केंद्रित रहा है।
जयपुर में हुई 16वीं ब्रिक्स व्यापार मंत्रियों की बैठक में, भारत ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) केंद्रित प्रणाली, मजबूत ग्लोबल वैल्यू चेन, MSME के अंतर्राष्ट्रीयकरण और डिजिटल सेवाओं पर जोर दिया। यहीं से व्यापार, निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था और नवाचार को कवर करने वाली "ब्रिक्स आर्थिक साझेदारी 2030 के लिए रणनीति" को भी आगे बढ़ाया गया।
भविष्य की चुनौती: आर्थिक ताकत से एकीकरण तक
ब्रिक्स की सबसे बड़ी सफलता आर्थिक से ज्यादा राजनीतिक है। 2025 के रियो डिक्लेरेशन में भी आईएमएफ और विश्व बैंक में विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की मांग की गई। ब्रिक्स मौजूदा वैश्विक आर्थिक ढांचे को नष्ट नहीं करना चाहता, बल्कि इसमें शक्ति के बंटवारे को बदलना चाहता है।
अगले दशक में ब्रिक्स के लिए चुनौती यह साबित करना नहीं है कि उसकी अर्थव्यवस्थाएं विशाल हैं, यह बात पहले ही साबित हो चुकी है। असली चुनौती उस आर्थिक जुड़ाव को बनाना है जिसकी उम्मीद इस बड़े समूह से की जाती है। 20 साल पूरे होने पर, ब्रिक्स ने वैश्विक आर्थिक ढांचे को बदलने से ज्यादा तेजी से वैश्विक आर्थिक 'विमर्श' को बदल दिया है। अगले 20 साल यह तय करेंगे कि क्या यह बहुध्रुवीय दुनिया के लिए सिर्फ एक राजनीतिक मंच बना रहता है, या फिर उस एकीकृत आर्थिक ताकत में तब्दील होता है, जिसके संकेत इसके आंकड़े दे रहे हैं।
(इनपुट: ANI)
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