सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक रिक्तियों और लंबित मामलों के बोझ को कम करने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में पांच सेवानिवृत्त जजों को तदर्थ न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की है।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम का अहम फैसला
हाईकोर्ट में न्यायिक रिक्तियों और मुकदमों के भारी बैकलॉग से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में पांच सेवानिवृत्त जजों को
‘एड-हॉक’ (तदर्थ) न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की है। यह पहला मौका है जब इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस प्रकार जजों की नियुक्तियां हो रही हैं। इनकी नियुक्ति दो वर्ष की अवधि के लिए होगी।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में पांच सेवानिवृत्त जजों को तदर्थ न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की है। न्यायिक व्यवस्था को मजबूती देने के लिए कॉलेजियम ने यह अहम कदम उठाया है। ये नियुक्तियां संविधान के अनुच्छेद 224ए के तहत की जाएंगी। संविधान का अनुच्छेद 224-A हाईकोर्ट में सेवानिवृत्त जजों की नियुक्ति से संबंधित है। इसे अक्सर ‘डॉकेट विस्फोट’ (मुकदमों की बाढ़) को नियंत्रित करने के लिए लिए एक संवैधानिक हथियार माना जाता है। अब तक बहुत कम मामलों में इस प्रावधान का प्रयोग किया गया है।
किन जजों के नाम पर लगी मुहर
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता में हुई कॉलेजियम की बैठक में पूर्व जज जस्टिस मोहम्मद फैज आलम खान, जस्टिस मोहम्मद असलम, जस्टिस सैयद अफताब हुसैन रिजवी जस्टिस रेणु अग्रवाल एवं जस्टिस ज्योत्सना शर्मा को तदर्थ न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की गई। इलाहाबाद हाईकोर्ट लंबित मुकदमों के बोझ तले दबा है। बड़ी तादाद में आपराधिक मामले लंबित हैं। ऐसे में तदर्थ नियुक्ति से उनका शीघ्र निस्तारण हो सकेगा। मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में लोक प्रहरी बनाम भारत संघ मामले में तदर्थ जजों को लेकर विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए थे। इस सांविधानिक प्रावधान के अनुसार, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति से सेवानिवृत्त जजों को पुनः न्यायिक कार्य के लिए आमंत्रित कर सकते हैं।
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