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कड़कड़डूमा कोर्ट का बड़ा फैसला

दिल्ली दंगा साजिश केस: उमर खालिद और शरजील इमाम को तगड़ा झटका, अदालत ने खारिज की जमानत याचिका

राजधानी दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने साल 2020 के दिल्ली दंगा मामले की साजिश से जुड़े मामले में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को बड़ा कानूनी झटका दिया है।

दिल्ली दंगा साजिश केस उमर खालिद और शरजील इमाम को तगड़ा झटका अदालत ने खारिज की जमानत याचिका

Court Dismisses Bail Pleas of Umar Khalid and Sharjeel Imam |

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने साल 2020 के दिल्ली दंगा मामले की साजिश से जुड़े मामले में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को बड़ा कानूनी झटका दिया है। अदालत ने शनिवार (4 जुलाई) को दोनों की नियमित जमानत याचिकाओं को यह कहते हुए सिरे से खारिज कर दिया कि वह इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी के फैसले से बंधी हुई है और शीर्ष अदालत के आदेश की अवहेलना नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश बना बड़ी बाधा

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) समीर बाजपेयी ने दोनों आरोपियों के वकीलों और दिल्ली पुलिस की दलीलों को विस्तार से सुनने के बाद यह फैसला सुनाया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि निचली अदालत के पास सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी 2026 के फैसले का पालन करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है, जिसमें दोनों आवेदकों की याचिकाओं को पहले ही खारिज किया जा चुका था।

ट्रायल कोर्ट ने रेखांकित किया कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने 5 जनवरी के फैसले में साफ शर्त रखी थी। शीर्ष अदालत के निर्देशानुसार, आवेदक अपनी जमानत की गुहार केवल दो ही स्थितियों में दोबारा लगा सकते हैं- या तो अभियोजन पक्ष (Prosecution) द्वारा पेश किए गए संरक्षित गवाहों (Protected Witnesses) की गवाही पूरी हो जाए, या फिर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की तारीख से एक वर्ष का समय बीत चुका हो, जो भी पहले हो।

ASJ समीर बाजपेयी ने 4 जुलाई को अपने आदेश में कहा, "सुप्रीम कोर्ट के उक्त आदेश का पालन करते हुए, यह अदालत वर्तमान आवेदनों पर विचार नहीं कर सकती और आवेदकों को जमानत नहीं दे सकती। वास्तव में, ये आवेदन सुनवाई के योग्य ही नहीं हैं और इन्हें खारिज किया जाता है।"

वकीलों की दलीलें और पुलिस का विरोध

उमर खालिद और शरजील इमाम के वकीलों ने अदालत के सामने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के 'सैयद इफ्तिखार अंद्राबी' मामले के फैसले के बाद परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया है। उन्होंने तर्क दिया कि इस नए न्यायिक उदाहरण के आधार पर जमानत याचिकाओं पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। न्यायाधीश ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी के बाध्यकारी निर्देशों को देखते हुए, वह इस बात की जांच भी नहीं कर सकते कि परिस्थितियां बदली हैं या नहीं। वकीलों ने यह भी कहा कि 'गुलफिशा फातिमा' और 'सैयद इफ्तिखार अंद्राबी' फैसलों के बीच विचारों की भिन्नता के मामले को पहले ही एक बड़ी बेंच को भेजा जा चुका है। लेकिन कोर्ट ने कहा कि चूंकि यह मुद्दा अभी तक अनसुलझा है, इसलिए वह किसी भी आधार पर इस जमानत याचिका पर विचार नहीं कर सकता।

अभियोजन पक्ष की सख्त दलीलें

दिल्ली पुलिस और अभियोजन पक्ष ने जमानत याचिकाओं का पुरजोर विरोध किया। सरकारी वकील ने कोर्ट को याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी को ही दोनों आवेदकों की विशेष अनुमति याचिकाओं (SLPs) को खारिज कर दिया था। इसके बाद 16 अप्रैल को उमर खालिद की समीक्षा याचिका (Review Petition) भी खारिज की जा चुकी है। ऐसी स्थिति में निचली अदालत जमानत नहीं दे सकती। अभियोजन पक्ष ने आगे तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद से ऐसी कोई ठोस और बुनियादी परिस्थिति नहीं बदली है, जिसके आधार पर इन जमानत याचिकाओं पर दोबारा विचार किया जाए।

शरजील इमाम की याचिका

शरजील इमाम की तरफ से एडवोकेट अहमद इब्राहिम के जरिए दायर जमानत अर्जी में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को छह महीने बीत जाने के बाद भी मामले में कोई महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हुई है और वह भी लगभग छह साल से हिरासत में हैं। आवेदन में शिकायत की गई कि छह महीने से अधिक का समय बीतने के बावजूद ट्रायल कोर्ट में मामले की रफ्तार बेहद धीमी है। आरोपों पर बहस अभी तक पूरी नहीं हो सकी है और मामला अभी तक आरोप तय करने के चरण तक भी नहीं पहुंचा है।

शरजील इमाम की याचिका में यह कूटनीतिक बिंदु भी उठाया गया कि जिस बेंच ने गुलफिशा फातिमा मामले में फैसला सुनाया था, उसी ने बाद में 22 मई को इसी बड़ी साजिश वाले केस के सह-आरोपी तस्लीम अहमद को अंतरिम जमानत दी थी। साथ ही, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 43D(5) के तहत जमानत के कानूनी नियमों के इस विवादित मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा गठित की जाने वाली एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया था। हालांकि इन तमाम दलीलों के बावजूद, कड़कड़डूमा कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी के आदेश को सर्वोपरि मानते हुए दोनों की अर्जियां खारिज कर दीं।
(यह खबर ANI से सीधे संपादित की गई है।)

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